केसर आम की बिक्री शुरूआम खाने के शौकीन लोगों के लिए अच्छी खबर है. सीजन शुरू होते ही बाजार में अब केसर आम आना शुरू हो गया है. गुजरात के जूनागढ़ के मार्केट यार्ड में केसर आम की आवक के साथ ही इसकी बिक्री भी शुरू हो गई है. केसर आम अपनी मिठास और खुशबू के लिए बहुत मशहूर है और देश ही नहीं, विदेशों में भी इसकी काफी मांग रहती है. इसे आम की सबसे बेहतरीन किस्मों में माना जाता है. हालांकि, इस साल मौसम खराब रहने की वजह से आम का उत्पादन कम हुआ है, इसलिए इसके दाम ज्यादा रहने की संभावना है.
सीजन की शुरुआत में बाजार में करीब 2000 बॉक्स केसर आम पहुंचे हैं. नीलामी के दौरान 10 किलो के एक बॉक्स की कीमत 800 से 1500 रुपये तक लगाई गई है, जो शुरुआत के हिसाब से ठीक मानी जा रही है. हालांकि, इस साल बेमौसम बारिश और मावठे का असर आम की फसल पर पड़ा है, जिससे कुछ जगहों पर नुकसान भी हुआ है. इसके बावजूद व्यापारियों और किसानों को उम्मीद है कि आगे चलकर आम की आवक बढ़ेगी और सीजन अच्छा रहेगा. वहीं, जैसे-जैसे बाजार में आम की मात्रा बढ़ेगी, वैसे-वैसे दाम में भी थोड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. फिलहाल शुरुआती दौर में केसर आम की अच्छी मांग बनी हुई है, जिससे किसानों और व्यापारियों दोनों को फायदा मिलने की उम्मीद है.
व्यापारियों के मुताबिक इस बार आम का सीजन लंबा चलने की संभावना है. साथ ही पिछले साल के मुकाबले इस साल केसर आम के दाम करीब 200 रुपये तक ज्यादा रहने की संभावना जताई जा रही है. पिछले वर्ष की तुलना में इस साल आम का उत्पादन भी बढ़ा है, लेकिन अगर मौसम का मिजाज बदला तो फसल पर असर पड़ सकता है. अगर मौसम अनुकूल रहा तो आम लोग भी इस सीजन में केसर आम का भरपूर स्वाद ले सकेंगे.
बारिश के कारण खेतों में पड़ी गेहूं, चना और बाजरी जैसी फसलों को भारी नुकसान हुआ है, जिससे किसानों को उचित कीमत मिलने की उम्मीद भी कम हो गई है. जूनागढ़ की प्रमुख बागवानी फसल केसर आम भी इस बार मौसम की मार से नहीं बच सकी. आम के पेड़ों पर आए कच्चे फल तेज हवा के कारण बड़ी संख्या में जमीन पर गिर गए हैं. एक किसान ने बताया कि उनके करीब 60 एकड़ के आम बाग में पहले ही लगभग 60 प्रतिशत फल गिरकर खराब हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि जो फल बचे हैं उनमें भी रोग लगने का खतरा बढ़ गया है, जिससे इस साल उत्पादन पर बड़ा असर पड़ेगा. (भार्गवी के. जोशी की रिपोर्ट)
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today