मॉनसून के बीच पहाड़ी आलू में लगी ये गंभीर बीमारी, इस दवा का छिड़काव करें किसान

मॉनसून के बीच पहाड़ी आलू में लगी ये गंभीर बीमारी, इस दवा का छिड़काव करें किसान

हिमाचल प्रदेश में खरीफ आलू की खेती बड़े पैमाने पर होती है. किसानों की रोजी-रोटी के लिए यह फसल बहुत महत्वपूर्ण है. अभी मॉनसून की बारिश के बीच आलू पर झुलसा रोग का प्रकोप देखा जा रहा है. इससे बचने के लिए ICAR-CPRI ने किसानों के लिए फसल एडवाइजरी जारी की है.

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मॉनसून के बीच पहाड़ी आलू में लगी ये गंभीर बीमारी, इस दवा का छिड़काव करें किसानहिमाचल प्रदेश में आलू पर झुलसा रोग का प्रकोप

मॉनसून का मौसम जोरों पर है और हिमाचल प्रदेश की मुख्य फसलों में से एक, आलू पर 'लेट ब्लाइट' (late blight) बीमारी का खतरा मंडरा रहा है. इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च–सेंट्रल पोटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-CPRI), शिमला ने इस बीमारी के फैलने की संभावना को लेकर चेतावनी जारी की है. हिमाचल प्रदेश में खरीफ सीजन में आलू की खेती बड़े पैमाने पर होती है जो कि किसानों की कमाई का जरिया भी है. लेकिन किसान आलू पर लगने वाले झुलसा रोग से परेशान हैं.
 
'फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टन्स' (Phytophthora infestans) से होने वाली 'लेट ब्लाइट' बीमारी (झुलसा रोग) आलू को प्रभावित करने वाली सबसे गंभीर और तेजी से फैलने वाली बीमारियों में से एक है. इससे खरीफ के मौसम में आलू की पैदावार में लगभग 30 से 50 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है. इसके लक्षणों में पत्तियों पर गहरे हरे रंग के, पानी से भीगे हुए धब्बे (lesions) शामिल हैं, जो बाद में भूरे या काले पड़ जाते हैं.

झुलसा रोग का लक्षण

इस बीमारी के कारण तनों पर जहां-तहां धब्बे और आलू के कंदों (tubers) में लाल-भूरे रंग की धंसी हुई सड़न भी हो सकती है. इस बीमारी से पूरी फसल चौपट हो जाती है और किसानों का भारी नुकसान होता है. आलू का कंद बदरंग हो जाता है जो खाने लायक और बिक्री लायक नहीं रह जाता.

ICAR-CPRI की ओर से जारी 'इंडो-ब्लाइटकास्ट' (पूरे भारत के लिए) पूर्वानुमान मॉडल में बताया गया है कि मौजूदा मौसम की स्थिति इस बीमारी के फैलने के लिए अनुकूल है और आने वाले दिनों में इसके मामलों में बढ़ोतरी की संभावना है. इसे देखते हुए, राज्य भर के आलू किसानों को इस बीमारी के संभावित प्रकोप के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी गई है.

इन दवाओं से होगा बचाव

किसानों से समय रहते बचाव के उपाय करने की अपील करते हुए, प्लांट प्रोटेक्शन डिवीजन के प्रमुख डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि जिन खेतों में अभी तक बीमारी के लक्षण नहीं दिखे हैं और फंगीसाइड (फफूंदनाशक) का छिड़काव नहीं किया गया है, वहां किसानों को 'सुगाही' (Sugahi) किस्मों पर मैन्कोजेब (Mancozeb) या क्लोरोथैलोनिल (Chlorothalonil) युक्त फंगीसाइड का इस्तेमाल करना चाहिए. इसकी मात्रा 0.2 से 0.25 प्रतिशत होनी चाहिए, या प्रति हेक्टेयर 1,000 लीटर पानी में 2.0 से 2.5 किलोग्राम दवा घोलकर छिड़काव करना चाहिए.

उन्होंने कहा, "अगर खेत में 'लेट ब्लाइट' बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो किसानों को डाइमेथोमोर्फ (Dimethomorph) @ 1.0 ग्राम प्रति लीटर पानी, या एमेटोक्ट्राडिन + डाइमेथोमोर्फ (Ametoctradin + Dimethomorph) @ 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी, या डाइमेथोमोर्फ 1.0 ग्राम + मैन्कोज़ेब 2.0 ग्राम (कुल मिश्रण 3.0 ग्राम) प्रति लीटर, या फ्लूओपिकोलाइड + प्रोपामोकार्ब (Fluopicolide + Propamocarb) @ 3.0 मिलीलीटर प्रति लीटर, या एजोक्सीस्ट्रोबिन + टेबुकोनाजोल (Azoxystrobin + Tebuconazole) @ 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर के हिसाब से फंगीसाइड का छिड़काव करना चाहिए."

10 दिन में करें फंगीसाइड का छिड़काव

जानकारों के अनुसार, फंगीसाइड का छिड़काव आम तौर पर हर 10 दिन में किया जा सकता है, हालांकि बीमारी की गंभीरता के आधार पर इस समय-सीमा में बदलाव किया जा सकता है. किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि वे एक ही फंगीसाइड का बार-बार इस्तेमाल न करें और हर छिड़काव के साथ 0.1 प्रतिशत स्टिकर (लगभग 1 मिली प्रति लीटर पानी) का इस्तेमाल करें. संस्थान ने किसानों को यह भी सलाह दी है कि वे अपने खेतों में पानी की सही निकासी की व्यवस्था करें और बीमारी को फैलने से रोकने के लिए खरपतवार नियंत्रण पर खास ध्यान दें.

हिमाचल प्रदेश में खरीफ (मॉनसून) के मौसम में आलू की खेती एक महत्वपूर्ण ऑफ-सीजन नकदी फसल है, जिसे उत्तर भारत में 'पहाड़ी आलू' के नाम से जाना जाता है. इसकी बुवाई अप्रैल से मई के बीच होती है और कटाई जुलाई से सितंबर तक चलती है. पहाड़ी इलाकों के लिए बेहतर इस फसल को 15°C से 24°C के बीच तापमान की जरूरत होती है.

मॉनसून की भारी बारिश के दौरान आलू में फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टन्स तेजी से पनपता है. इसे देखते हुए आईसीएआर-सीपीआरआई फसल को लेट ब्लाइट से बचाने के लिए फंगीसाइड छिड़काव और इंडो-ब्लाइटकास्ट पूर्वानुमान मॉडल का पालन करने की पुरजोर सलाह देता है, क्योंकि लेट ब्लाइट से उत्पादन 30% से 50% तक कम हो सकता है.

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