सुरजीत सिंह उगाई सॉल्ट टॉलरेंट वैरायटी KRL 210हरियाणा के करनाल जिले के किसान सुरजीत सिंह ने खारी जमीन पर गेहूं की खेती में ऐसी मिसाल कायम की है, जो सामान्य खेती के तरीकों को भी मात देती है. आमतौर पर माना जाता है कि खारे जमीन से गेहूं की पैदावार कम मिलती है, लेकिन सुरजीत सिंह ने सॉल्ट टॉलरेंट गेहूं वैरायटी KRL‑210 की मदद से इस मिथक को गलत साबित कर दिया.
करनाल स्थित आईसीएआर‑सीएसएसआरआई द्वारा विकसित गेहूं की किस्म KRL‑210 खारी जमीन के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है, जिससे 65–71 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज मिल सकती है. सुरजीत सिंह ने इस किस्म को नवंबर के पहले और दूसरे सप्ताह में बोया और पूरी प्रक्रिया को समझदारी से अपनाया.
जहां साधारण गेहूं खेती के लिए खेत की जुताई होती है, वहीं किसान ने जीरो टिलेज अपनाया. साथ ही सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल तकनीक से बुआई की. बाकी किस्मों में जहां 100 किलो बीज प्रति हेक्टेयर लगता है, वहीं उन्होंने केवल 55 किलो बीज में खेती कर ली.
खाद के उपयोग में भी उन्होंने मिसाल पेश की. अन्य किस्मों के मुकाबले नाइट्रोजन की मात्रा को 195 किलो से घटाकर 135–140 किलो प्रति हेक्टेयर किया. फास्फोरस की मात्रा 60 किलो रखी, जिससे फसल को बेहतर पोषण मिला. पानी की बचत में भी वे आगे रहे — पूरे सीजन में केवल 1–2 सिंचाई दी, जबकि सामान्य गेहूं में यह संख्या 3–4 होती है.
इन आधुनिक और कम लागत तकनीकों का नतीजा शानदार रहा. जहां सामान्य गेहूं किस्मों में लगभग 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार मिलती है, वहीं सुरजीत सिंह ने 71 क्विंटल तक उपज प्राप्त की. खर्च की बात करें तो KRL‑210 की खेती में खर्च लगभग 13,000 रुपये प्रति हेक्टेयर आया, जबकि अन्य किस्मों में यह लागत 20,000 रुपये तक होती है.
उपज की बिक्री से उन्हें 114,970 रुपये प्रति हेक्टेयर (1625 रुपये प्रति क्विंटल) की कमाई हुई, जो आम किस्मों से मिलने वाली करीब 97,500 रुपये की आय से काफी अधिक है. कुल मिलाकर, सुरजीत सिंह की यह सफलता कहानी बताती है कि उचित किस्म, तकनीक और खेती में नवाचार अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उपज हासिल कर सकते हैं.
सुरजीत सिंह की यह सफलता उन किसानों के लिए एक संदेश है जो खारी जमीन को गेहूं की खेती के लिए उपयुक्त नहीं मानते. जिन किसानों को बढ़े पीएच मान से गेहूं की खेती करने में खतरा दिखता है. ऐसे किसानों के लिए सुरजीत सिंह की खेती ने एक नया मॉडल पेश किया है कि कम खर्च और विपरीत परिस्थितियों में भी गेहूं से बंपर उपज ली जा सकती है.
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