बिहार में शाही लीची की आमद शुरूमई की तपती गर्मी में जहां लोग बेहाल रहते हैं. वहीं बिहार के बागानों से आने वाली शाही लीची का भी लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है. अब धीरे-धीरे बागानों से निकलकर बिहार की मशहूर शाही लीची बाजारों तक पहुंचने लगी है. राजधानी पटना समेत राज्य के कई जिलों में लोग इसके मीठे और रसीले स्वाद के लिए अच्छी-खासी कीमत चुकाने को तैयार हैं.
हालांकि इस बार नवंबर और दिसंबर में मौसम के बदले मिजाज का असर लीची उत्पादन पर पड़ा है, जिससे पैदावार कुछ प्रभावित हुई है. इसके बावजूद बाजारों में शाही लीची की आमद शुरू हो चुकी है और लोगों की खरीदारी भी बढ़ने लगी है.
फिलहाल बाजार में सामान्य क्वालिटी की लीची करीब 100 रुपये किलो, जबकि बेहतर क्वालिटी की शाही लीची 200 से 250 रुपये किलो तक बिक रही है. गर्मी के इस मौसम में शाही लीची की मिठास लोगों को राहत देने का काम कर रही है. लीची के क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक उद्यमी कृष्ण गोपाल कहते हैं कि इस साल मौसम की मार और स्टिंक बग के प्रकोप का असर इतना रहा कि उत्पादन में 60 से 70 प्रतिशत तक कमी आई है, लेकिन लागत हर साल की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है.
वे बताते हैं कि पिछले साल जहां एक पैकेट पर मंजर आने से लेकर पैकेजिंग तक करीब 400 रुपये खर्च आता था, वहीं इस बार यह खर्च बढ़कर 800 से 900 रुपये के बीच पहुंच चुका है. वहीं मुजफ्फरपुर में बेहतर क्वालिटी की शाही लीची 2000 से लेकर 2500 रुपये प्रति पैकेट बिक रही है, जिसमें करीब 10 किलो लीची होती है. जबकि सामान्य क्वालिटी की लीची 1000 से 1200 रुपये प्रति पैकेट के बीच बिक रही है. मुजफ्फरपुर शहर में 300 से लेकर 400 रुपये सैकड़ा यानी की 100 लीची के दाने बिक रहे हैं जो करीब दो से ढाई किलो के आसपास होते हैं.
सामाजिक उद्यमी कृष्ण गोपाल प्रति पेड़ लागत और उत्पादन का पूरा हिसाब बताते हुए कहते हैं कि सामान्यतः लीची के सीजन में मंजर आने के बाद से लेकर फल तोड़ने तक लगभग तीन बार स्प्रे किया जाता है. एक एकड़ में एक स्प्रे पर करीब 20,000 रुपये तक खर्च आता है. वहीं, एक पेड़ पर पूरे सीजन में स्प्रे का खर्च लगभग 90 से 100 रुपये तक पड़ता है. लेकिन इस साल स्थिति पूरी तरह अलग रही. बेमौसम बारिश और स्टिंक बग कीट के बढ़ते प्रकोप के कारण किसानों को बार-बार दवाइयों का छिड़काव करना पड़ा. इस बार 5 से 6 बार तक स्प्रे करना पड़ा. इससे एक पेड़ पर स्प्रे का खर्च बढ़कर लगभग 200 रुपये तक पहुंच गया.
एक पेड़ से लगभग 120 किलो तक लीची का उत्पादन हो जाता है. वहीं इस बार उत्पादन में 50 से 60 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई. किसानों का कहना है कि पहले एक पेड़ से 10 पेटी तक लीची निकल जाती थी, लेकिन इस बार एक पेटी निकालना भी मुश्किल हो गया है. वहीं, इस बार बाजार में लीची का जो भाव मिल रहा है, उससे किसानों और व्यापारियों की लागत तक निकल पाना कठिन हो गया है.
लीची ग्रोवर एसोसिएशन के अध्यक्ष बच्चा सिंह कहते हैं कि इस बार पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, जंगीपुर, कृष्णानगर सहित आसपास के इलाकों और जिलों में लीची का उत्पादन काफी अच्छा हुआ है, जो बीते 5 मई से लेकर आने वाले 10 जून तक देश के विभिन्न राज्यों में लीची की जरूरत को काफी हद तक पूरा कर रहा है. वहीं, बिहार में उत्पादन कम होने के बावजूद लीची के दाम नहीं बढ़ पाने की एक वजह यह भी है.
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