
कृषि वैज्ञानिकों ने धान रोपाई कीबिहार में धान की रोपनी धीरे-धीरे शुरू हो चुकी है. इसी क्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना ने सामूहिक धान रोपनी कार्यक्रम का आयोजन किया, जहां संस्थान के वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने किसानों के साथ खेत में उतरकर धान की रोपनी की. वहीं, इस समय राज्य के अंदर पर्याप्त बारिश न होने के कारण धान की रोपनी करीब 12 प्रतिशत ही हो पाई है. राज्य में अभी तक सामान्य से कम बारिश होने की वजह से बिहार के धान उत्पादक जिलों में रोपनी का काम काफी धीमा पड़ा हुआ है. आईसीएआर के पूर्वी अनुसंधान परिसर के निदेशक अनूप दास ने बताया कि राज्य में करीब 90 फीसदी धान की नर्सरी तैयार हो चुकी है.
आर्द्रा नक्षत्र से धान की रोपनी का काम तेजी से शुरू हो जाता है. लेकिन, बिहार में जहां धान नर्सरी पूरी तरह से खेत में लगने के लिए तैयार हो चुकी है. वहीं, उस रफ्तार से धान की रोपनी शुरू नहीं हुई है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के निदेशक डॉ. अनूप दास ने बताया कि धान पूर्वी भारत और बिहार की प्रमुख खरीफ फसल है तथा वर्तमान में बारिश सामान्य से कम होने के कारण किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
उन्होंने बताया कि राज्य में अब तक लगभग 90 प्रतिशत धान की नर्सरी तैयार हो चुकी है, जबकि लगभग 12 प्रतिशत क्षेत्र में धान की रोपनी का काम पूरा हुआ है. बारिश की कमी के कारण रोपनी की गति उम्मीद के लिहाज से उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी है. फिर भी किसान उपलब्ध संसाधनों के साथ खेती के कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं.
सामूहिक धान रोपनी कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने स्वर्ण पूर्वी धान-3 की रोपनी की. इस किस्म की विशेषता बताते हुए निदेशक डॉ. अनूप दास ने कहा कि यह वैरायटी 115 से 120 दिनों के बीच तैयार हो जाती है. धान की अन्य किस्मों की तुलना में इसमें लगभग 25 से 30 तक प्रतिशत कम पानी लगता है.

स्वर्ण पूर्वी धान-3 की प्रजाति को विकसित करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक संतोष कुमार ने बताया कि इसका उत्पादन 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होता है. वहीं, इस प्रजाति में कई तरह के रोगों को सहने की क्षमता है. यह पतले दाने वाली धान की प्रजाति है. इसके साथ ही इसकी ऊंचाई भी बहुत अधिक नहीं होती है.
निदेशक ने बताया कि बदलती जलवायु परिस्थितियों और अनिश्चित मॉनसून को ध्यान में रखते हुए संस्थान किसानों को धान की सीधी बुवाई यानी डीएसआर तकनीक को अपनाने की सलाह दे रहा है. यह तकनीक कम पानी, कम मेहनत और कम लागत में धान उत्पादन का असरदार विकल्प देती है.
उन्होंने किसानों को कम अवधि वाली सूखा सहन करने वाली उन्नत धान किस्मों, जैसे स्वर्ण श्रेया और स्वर्ण पूर्वी धान-3, को अपनाने की सलाह दी. इसके साथ ही उन्होंने धान उत्पादन में वैज्ञानिक तकनीकों के महत्व के बारे में बताते हुए कहा कि बेहतर उत्पादन के लिए नर्सरी प्रबंधन, कतारबद्ध रोपाई, संतुलित उर्वरक और जल प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और समेकित फसल प्रबंधन अपनाना जरूरी है.
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