Stomach Worms: पशुओं की हैल्थ तो खराब होती ही है उत्पादन भी घटता है, ऐसे कंट्रोल होंगे पेट के कीड़े 

Stomach Worms: पशुओं की हैल्थ तो खराब होती ही है उत्पादन भी घटता है, ऐसे कंट्रोल होंगे पेट के कीड़े 

Stomach Worms पशुओं के पेट में कीड़े होने से पशुपालक को कई तरह का नुकसान उठाना पड़ता है. पेट में कीड़े होने पर गाय-भैंस हो या भेड़-बकरी सभी अपनी सामान्य खुराक से ज्यादा चारा खाते हैं. दूसरी और दूध उत्पादन और ग्रोथ कम हो जाती है. वहीं इस परेशानी के चलते पशुपालक को इलाज पर भी खर्च करना पड़ता है. 

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Stomach Worms: पशुओं की हैल्थ तो खराब होती ही है उत्पादन भी घटता है, ऐसे कंट्रोल होंगे पेट के कीड़े गौसेवा के दावों पर सवाल (सांकेतिक तस्वीर)

छोटी सी दिखने वाली पेट के कीड़ों की परेशानी बड़ी वजह बन जाती है. जहां पशुपालक से थोड़ी सी भी लापरवाही हुई तो वहीं पशुओं की हैल्थ के साथ ही उसका असर उत्पादन पर भी देखने को मिलता है. इसीलिए एनिमल एक्सपर्ट सालभर नियमानुसार पशुओं को पेट के कीड़ों (कृमि परजीवी) की दवाई खि‍लाने की सलाह देते हैं. ये परेशानी ज्यादातर बरसात के मौसम में होती है, लेकिन सामान्य दिनों में ये नहीं होगी ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है. एक्सपर्ट की मानें तो इसकी सबसे बड़ी वजह दूषि‍त पानी है.

दूषि‍त चारा और चारे के साथ मिट्टी का लगना भी इसकी वजहों में शामिल है. पशु गाय-भैंस हो या भेड़-बकरी, सभी छोटे-बड़े पशुओं के पेट में कीड़े होना आम बात है. ज्यादातर पशुओं को इसका सामना करना पड़ता है. एक्सपर्ट का कहना है कि पशुओं के बाड़े में और पशुओं को खुले में चराने के दौरान कुछ उपाय अपनाकर पशुओं में ये बीमारी होने से रोका जा सकता है. 

ये है पेट के कीड़ों से जुड़ी जरूरी जानकारी 

  • पशु के पाचनतंत्र के अंदर रहकर उसके उत्तक द्रव और खून को चूसते हैं. 
  • ये पशुओं के फेफड़े, सांसनली और आंख आदि में भी पाए जा सकते हैं.
  • इनके अंडे गोबर के साथ बाहर आते हैं जो चारागाह, दाना और पानी के स्रोतों को दूषित करते हैं.
  • ये चार प्रकार के होते हैं, हुककृमि (खून चूसने वाला), फीताकृमि (पाचनतंत्र में पाए जाते हैं),) एम्फीस्टोम (चपटे कृमि रूमेन और लीवर में पाए जाते हैं), सिस्टोसोम (रक्त शिराओं में पाए जाते हैं).
  • पशु के पेट में कौनसा कृमि है उसी के आधार पर उपचार किया जाता है. 

पशु के पेट में होने के लक्षण

  • दस्त, ग्रोथ में देरी, दुग्ध उत्पादन में कमी, प्रजनन क्षमता में कमी, काम करने की क्षमता का कम होना, बीमारी से लड़ने में कमजोर होना और खून की कमी होना. 
  • एम्फीस्टोम कृमि के होने पर भीषण बदबूदार दस्त और निचले जबड़े में पानी भर जाता है. 
  • एम्फीस्टोम कृमि के होने पर कभी-कभी पीलिया भी हो जाता है. 
  • फीताकृमि के संक्रमण में लटकता हुआ उदर और गोबर में इसका हिलता हुआ छोटा सफेद टुकड़ा देखा जा सकता है. 
  • हुक कृमि और सिस्टोसोम के होने पर खून की कमी खूनी दस्त हो जाते हैं. 
  • नाक बहना और सांस लेने में खर्राटे आना सिस्टोसोमस की पहचान है. 
  • पशु के फेफड़े में कृमि की वजह से खांसी हो सकती है.

पेट के कीड़ों की रोकथाम और उपचार

  • बछड़ी को प्रथम कृमिनाशक की खुराक 10-14 दिन की उम्र पर देनी चाहिए. 
  • जब तक बछड़ी छह महीने की ना हो जाए डाक्टरी सलाह पर खुराक देते रहें. 
  • छह महीने या उससे अधिक उम्र के सभी पशुओं को साल में दो बार कृमिनाशक दवा पहली बार बरसात के पहले और दूसरी बार बरसात के अंत में देनी चाहिए. 
  • रूमेन बाईपास से बचने के लिए दवा मुंह में देने की बजाए जीभ के पीछे देनी चाहिए.
  • जमीन में इनके अंडों की संख्या कम करने के लिए दवा का छिड़काव करना चाहिए. 
  • गाभिन पशुओं को भी कृमिनाशक दवा दो बार पहली खुराक प्रसव के आसपास और दूसरी खुराक प्रसव के 6-7 सप्ताह बाद देनी चाहिए .
  • यदि उपचार से पशु को फायदा नहीं होता तो उसके गोबर को पशुचिकित्सक से जांच कराकर कृमि संक्रमण अनुसार ही दवाई का इस्तेमाल करना बाहिए .
  • नमी वाली जगह पर घोंघे आदि पनपते हैं जहां फ्लुक और सिस्टोसोम के संक्रमण का अंदेशा हो सकता है. क्योंकि इन परजीवियों का जीवन चक्र घोंघे के बगैर पूरा नहीं हो सकता .
  • दवा के प्रति प्रतिरोध से बचने के लिए एक ही किस्म की दवाई का बार-बार इस्तेमाल ना करें.
  • कृमि की दवाई का इस्तेमाल डाक्टरी सलाह पर ही करें, खुद से इलाज कभी ना करें. 

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