
पशुओं के लिए गर्मी के साथ ही मक्खी-मच्छर, चिचड़ का प्रकोप भी शुरू हो जाता है. मेडिकल की भाषा में इन्हें वेक्टर भी कहा जाता है. गाय-भैंस के लिए ये वो परेशानी है जिसके चलते उत्पादन तो घटता ही है, साथ में इसका बड़ा असर पशुओं की सेहत पर भी देखने को मिलता है. ये कई छोटी-बड़ी बीमारियों की वजह भी होते हैं. इसमे से कुछ तो इतने खतरनाक होते हैं कि ये पशुओं के खून में भी शामिल हो जाते हैं. वैसे तो ऐसा माना जाता है कि बरसात के दिनों में ये ज्यादा सक्रिेय होते हैं, लेकिन ये भी सच्चाई है कि अब इनका प्रकोप गर्मियों में भी देखा जाता है. इसलिए ये जरूरी है कि पशुओं को इनसे बचाने के लिए एक्सपर्ट के बताए टिप्स अपनाएं जा सकते हैं.
घर पर भी घरेलू उपाय किए जा सकते हैं. मच्छर-मक्खी, जोंक, किलनी से पशुओं को होने वालीं बीमारियां हमेशा से ही पशुपालकों की बड़ी परेशानी रही हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक ये परेशानी अब और बड़ी हो गई है. अभी तक परजीवी रोगों का इलाज कुछ खास तरह की दवाई देकर हो जाता था. लेकिन अब परेशान करने वाली बात ये है कि बीते कुछ वक्त से दवाईयां भी पशुओं पर असर नहीं कर रही हैं. जिसकी बड़ी वजह परजीवी विरोधी प्रतिरोध (एंटीपैरासिटिक रेसिस्टेंस) है.
दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल (ओवरयूज). एंटीपैरासिटिक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल और उस पर कंट्रोल ना होना परजीवियों में प्रतिरोधकता बढ़ने की एक बड़ी वजह है. सही तरह से दवाई ना लेना, पशुओं को सही तरीके से दवाई ना देना, डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाई का पूरा कोर्स ना करना भी एक वजह है. पर्यावरणीय और जैविक कारण भी हैं. परजीवियों की प्राकृतिक चयन प्रक्रिया और उनके जीन में होने वाले बदलाव भी प्रतिरोधकता का कारण बन रहे हैं.
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