पशुपालकों से दूध संग गोबर खरीदकर उन्हें करोड़ों रुपये का भुगतान किया जा रहा है.वजह जो भी हो, लेकिन गैस की कमी को लेकर बहुत सारी चर्चाएं हो रही हैं. गैस की कमी को हर कोई अपनी जरूरत की चीजों से जोड़कर बात कर रहा है. सब कयास लगा रहे हैं कि गैस की कमी हो गई तो ये महंगा हो जाएगा, या फिर गैस की कमी से काफी सारी चीजों का तो उत्पादन ही बंद हो जाएगा. ऐसे ही डेयरी को भी गैस की कमी से जोड़कर तमाम तरह की बातें हो रही हैं. लेकिन आपको बता दें कि देश में गैस और बिजली की कितनी भी किल्लत या मारामारी हो जाए, लेकिन न तो देश में दूध की सप्लाई रुकेगी और न ही डेयरी प्लांट की मशीनरी थमेगी. और ये सब मुमकिन होगा नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड (NDDB) के प्लान से.
ये एनडीडीबी की कोशिशों का ही नतीजा है कि गैस और बिजली से चलने वाले डेयरी प्लांट अब धीरे-धीरे गोबर से बनने वाली गैस और बिजली पर जा रहे हैं. कुछ डेयरी प्लांट 50 फीसद तक जा चुके हैं तो कुछ को 100 फीसद तक गोबर आधारित गैस-बिजली पर लाने की तैयारी चल रही है. देश के 15 राज्यों की 26 मिल्क कोऑपरेटिव को देश में हर रोज 16 करोड़ टन गोबर खरीद करने के लिए कहा गया है. पशुपालक अब रोजाना दूध संग गोबर भी बेच रहे हैं.
पशुपालकों और डेयरी प्लांट के बीच बॉयो गैस प्लांट को नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड प्रचारित कर रही है. गैस प्लांट का डिजाइन और दूसरी तकनीकी चीजें भी एनडीडीबी की मदद से ही तैयार की गई हैं. बिहार में सुधा डेयरी भी इसी पैटर्न पर काम कर रही है. हरियाणा में वीटा डेयरी प्लांट बना रही है. वहीं असम में तो 100 फीसद बिजली की जरूरत बॉयो गैस से ही पूरी की जाएगी. इसी को ध्यान में रखते हुए वहां डेयरी प्लांट बन रहा है.
एनडीडीबी ने जकरिया मॉडल भी तैयार किया है. इसे खासतौर पर पशुपालक अपना रहे हैं. इस मॉडल के तहत घरों के लिए भी प्लांट बनाकर गैस इस्तेमाल की जा सकती है. इस मॉडल में रोजाना 40 से 50 किलो गोबर इस्तेमाल कर हर महीने डेढ़ से दो सिलेंडर के बराबर गैस बन जाती है. इसके साथ ही गैस बनने के बाद बची गोबर की स्लरी खेतों में इस्तेमाल की जा सकती है. इन सब के लिए सरकार सब्सिडी भी दे रही है.
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