एनिमल हसबेंडरी मंत्रालय की रिपोर्ट.बीते ढाई दशक से दूध उत्पादन में भारत लगातार नंबर वन बना हुआ है. अगर पोल्ट्री की बात करें तो हम अंडा उत्पादन में दूसरे नंबर पर और चिकन उत्पादन में 5वें नंबर पर आ गए हैं. उत्पादन के मामले में ये एक बड़ी कामयाबी है. कई बड़े विकसित देश इस मामले में भारत से बहुत पीछे हैं. लेकिन इस कामयाबी के साथ ही एक परेशान करने वाली बात ये है कि डेयरी प्रोडक्ट और अंडे एक्सपोर्ट के मामले में हम सिर्फ अपनी उपस्थिाति दर्ज करा पा रहे हैं, वहीं चिकन एक्सपोर्ट के मामले में हमारा कोई आंकड़ा नहीं है.
अंडे के मामले में तो हालत ये है कि कतर ने हमारे यहां का अंडा बैन कर दिया था. डेयरी प्रोडक्ट एक्सपोर्ट के मामले में भी हम ज्यादातर घी-मक्खन तक ही सीमित हैं. उत्पादन की बात करें तो लगातार बढ़ रहा है, लेकिन चाहकर भी हम एक्सपोर्ट नहीं बढ़ा पा रहे हैं. यही वजह है कि जब खपत नहीं बढ़ पा रही है तो पशुपालकों का मुनाफा भी नहीं बढ़ पा रहा है. और इस सब की वजह है पशुपालन में बढ़ता एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल.
एपीडा ने घी से जुड़ी एक रिर्पोर्ट जारी की है. रिपोर्ट में घी एक्सपोर्ट से जुड़े कुछ आंकड़े हैं. घी एक्सपोर्ट में न्यूजीलैंड, नीदरलैंड और यूएसए पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं. भारत लिस्ट में चौथे नंबर पर है. लेकिन ग्रोथ के मामले में भारत पहले नंबर पर है. साल 2025 के मुकाबले 2026 में 10 फीसद की ग्रोथ हुई है. 2025 में 30.7 हजार टन घी का एक्सपोर्ट भारत से हुआ था. जबकि 2026 में ये बढ़कर 33.8 हजार टन हो गया है.
पोल्ट्री एक्सपर्ट की मानें तो हमारे देश में अंडों का उत्पादन 15 हजार करोड़ सालाना को पार कर चुका है. वहीं चिकन उत्पादन 50 लाख टन सालाना से ऊपर जा चुका है. अंडा एक्सपोर्ट की बात करें तो खाड़ी देशों के अलावा एक-दो देशों को और जाता है. जबकि चिकन एक्सपोर्ट तो लगातार पिछड़ा हुआ है.
एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो बीमारियों से बचाने के लिए पोल्ट्री फार्मर और पशुपालक एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करते हैं. कई बार तो बीमारी होने से पहले ही दवाई खिला दी जाती है. जिसका असर ये होता है कि पशुओं में एंटीमाइक्रोबायल रेजिस्टेंस (AMR) पैदा हो जाता है. एएमआर एक ऐसी स्टेज है जिसमें किसी बीमारी को ठीक करने के लिए जो दवा या एंटीबायोटिक दी जाती है वो काम करना बंद कर देती है. कुछ बैक्टीरिया कई दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता डवलप कर लेते हैं जिससे वो दवाएं असर करना बंद कर देती हैं. और जब प्रोडक्ट एक्सपोर्ट होते हैं तो जांच के दौरान दवाई की मौजूदगी उसमे पाई जाती है.
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