
भेड़ का मतलब ऊन. 15-20 साल पहले तक तो ऐसा ही था. यह बात अलग है कि अब भेड़ से जुड़े मायने बदल गए हैं. अब भेड़ की पहचान ऊन से ज्यादा उसके मीट से होने लगी है. मीट की डिमांड भी ऐसी कि एक राज्य की मीट की डिमांड को पूरी करने के लिए कई राज्य मिलकर भेड़ों की सप्लाई कर रहे हैं. और इस सब का असर ये पड़ा कि कालीन (कालीन) कारोबार कहीं पीछे छूट गया. देश का जाना-माना कालीन कारोबार दोराहे पर आ गया है.
खुद पूर्व केंद्रीय मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्री परुषोत्तम रूपाला भी घटते ऊन उत्पादन पर चिंता जाहिर कर चुके हैं. वूल एक्सपर्ट की मानें तो गद्दी नस्ल की भेड़ की ऊन सबसे अच्छी मानी जाती है. यह भेड़ खासतौर पर ठंडे इलाकों में पाली जाती है. गद्दी भेड़ से मिलने वाली ऊन से कपड़े बनाए जाते हैं. लेकिन अफसोस की इसका उत्पादन भी बहुत कम है. इस भेड़ की संख्या भी देश में सिर्फ 6.70 लाख ही बची है.
आगरा के कालीन कारोबारी सुनील की मानें तो कालीन कारोबार के लिहाज से 30 माइक्रोन की ऊन चाहिए होती है. लेकिन इस पैमाने की ऊन कुछ ही नस्ल की भेड़ से मिलती है. बाकी तो 35 और 40 माइक्रोन तक की ऊन देती हैं. लेकिन इसके साथ ही ऊन के कम प्रोडक्शन की परेशानी भी खड़ी हो गई है. अभी तो इस कमी का ज्यादा असर इसलिए नहीं दिख रहा है कि इंटरनेशनल मार्केट में रुस और उक्रेन युद्ध के चलते डिमांड कम है.
लेकिन जैसे ही डिमांड आएगी तो कालीन कारोबार के पास हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के सिवा कुछ नहीं होगा. अभी भी हम जो थोड़ा बहुत काम चला रहे हैं वो तुर्की की ऊन से चल रहा है. लेकिन वो बहुत महंगी होती है. इसलिए हम तुर्की की ऊन में भारतीय ऊन मिलाकर किसी तरह से काम चला रहे हैं.
केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर, राजस्थान के डायरेक्टर अरुण कुमार ने किसान तक को बताया देश में पल रहीं कुछ भेड़ में से सिर्फ 40 फीसद ही भेड़ ऐसी होती हैं जो ऊन देती हैं. मारवाड़ी, चोकला और मगरा भेड़ सबसे ज्यादा ऊन देने वालीं भेड़ हैं. बाकी बची देश की 60 फीसद भेड़ ऊन नहीं सिर्फ दूध और मीट के लिए पाली जाती हैं. दक्षिण भारत में बड़ी संख्या में भेड़ पाली जाती हैं. लेकिन वहां भी सिर्फ तीन खास नस्ल दक्कनी, नीलगिरी, मंडया को छोड़कर बाकी की कोई भी नस्ल ऊन नहीं देती है.
अरुण कुमार ने बताया कि देश में उत्पादित होने वाली 90 फीसद ऊन का इस्तेकमाल कालीन में किया जाता है. जिससे भेड़ पालकों को एक बाजार मिल जाता है. लेकिन अब विदेशों से भी ऊन आने लगी है. हमारे देश के मुकाबले यह सस्ती ऊन है. भेड़ पालकों की रही-सही कमर बिचौलिए तोड़ देते हैं. देश में कहीं भी ऊन खरीद केन्द्र नहीं है. जिसके चलते बिचौलिए सस्ते दाम पर भेड़ पालकों से ऊन खरीदकर बाजार में महंगे दाम पर बेचते हैं. जबकि विदेशों में हमारे यहां की मगरा भेड़ की ऊन से बने कालीन की बहुत डिमांड है. लेकिन भेड़ पालन में ऊन के लिए रुझान कम होता जा रहा है.
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