सोयाबीन के दाम में भारी गिरावट. (सांकेतिक तस्वीर)विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकार हर तरह की कोशिश कर रही है. एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील से लेकर पेट्रोल-डीजल की कम खपत तक की अपील की जा रही है. लेकिन डॉलर बचाने की ऐसी ही कोशिशों के बीच एक रोचक खबर सामने आ रही है. मुर्गियों के लिए विदेशों से सोयाबीन मील खरीदने की मांग हो रही है. देश में सोयाबीन मील महंगा होने के चलते मुर्गियों का फीड महंगा होने लगा है. खासतौर पर छोटे पोल्ट्री फार्मर के सामने संकट खड़ा हो गया है. सबसे ज्यादा परेशानी पोल्ट्री फार्म में अंडे का उत्पादन करने वालों के सामने आ रही है. गर्मियों के दौरान अंडों के दाम गिर जाते हैं.
अंडों की खपत कम हो जाती है. लेकिन मुर्गियों को फीड रोजाना की तरह खुराक के मुताबिक ही चाहिए. ऐसे में पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने अस्थाई तौर पर विदेशों से सोयाबीन खरीदने की मंजूरी देने की मांग की है. इस संबंध में पीएफआई ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) समेत दो अन्य मंत्रालय को एक पत्र लिखा है. वहीं जल्द ही पीएमओ सहित दोनों मंत्रालयों में मुलाकात के लिए वक्त मांगा है.
पीएफआई के प्रेसिडेंट रनपाल ढांढा ने किसान तक को बताया कि पोल्ट्री फीड में प्रोटीन का मुख्य सोर्स सोयाबीन मील है. लेकिन इस वक्त सोयाबीन मील का दाम 65 रुपये किलो से 70 रुपये तक पहुंच गया है. आज सोयाबीन की एमएसपी और बाजार के दाम में बहुत अंतर आ गया है. हम भी चाहते हैं कि सोयाबीन के किसान को उसकी फसल का सही दाम मिले.
लेकिन जब अंतर ज्यादा हो जाता है तो फिर उसका असर पोल्ट्री फीड पर दिखाई देने लगता है. और अब यही हो रहा है. महंगे पोल्ट्री फीड के चलते पोल्ट्री फार्मर कम दाम पर अपनी मुर्गियां बेचने को मजबूर हैं. कुछ ऐसे भी है जो कुछ वक्त के लिए पोल्ट्री फार्म को बंद कर रहे हैं.
रनपाल ढांढा ने बताया कि हमने पीएमओ, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और पशुपालन मंत्री डॉ. एसपी सिंह बघेल को एक पत्र लिखा है. पत्र में मांग की गई है कि देश में सोयाबीन के बढ़ते रेट को देखते हुए अस्थाई तौर पर विदेशों से सोयाबीन खरीदने की मंजूरी दी जाए. सस्ते दाम को देखते हुए ब्राजील, यूएस और अर्जेंटीना से सोयाबीन मील खरीदा जा सकता है. वहीं पोल्ट्री फीड को सुरक्षा देने के लिए टॉस्क फोर्स बनाने की भी मांग की गई है. टॉस्क फोर्स फीड की उपलब्धता और उसके रेट पर नजर रखेगी.
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