केज फ्री पोल्ट्री फार्मिंग से किसान बनेंगे आत्मनिर्भर.पोल्ट्री एक्सपर्ट की मानें तो आज देश का पोल्ट्री सेक्टर ऐसे मुकाम पर है जहां कभी भी डिमांड के मुताबिक अंडे-चिकन का प्रोडक्शन बढ़ाया जा सकता है. अगर थोड़ी सी सरकारी मदद मिले तो पोल्ट्री सेक्टर इंटरनेशनल मार्केट में भी अपनी धाक जमा सकता है. आज गिनती के कुछ ही देशों में अंडा एक्सपोर्ट होता है. लेकिन पोल्ट्री सेक्टर में टेक्नोलॉजी को लेकर थोड़ा सा भी काम हो जाए तो अंडा ही नहीं चिकन का एक्सपोर्ट भी होने लगेगा. अंडा और चिकन उत्पादन के मामले में इंडियन पोल्ट्री सेक्टर विश्व के कई बड़े देशों से आगे हैं. ऐग प्रोडक्शन के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है. चिकन में भी देश का नंबर आठवां है. ये कहना है पोल्ट्री इंडिया एक्सपो-2024 में हिस्सा लेने आए पोल्ट्री एक्सपर्ट का. हाल ही में तीन तक बीते महीने हैदराबाद में एक्सपो का आयोजन किया गया था.
एक्सपर्ट का कहना है कि पोल्ट्री सेक्टर हर साल छह से आठ फीसद की दर से बढ़ रहा है. पोल्ट्री सेक्टर का जोखिम कम करने के लिए पोल्ट्री फार्मर लगातार एमएसपी से लेकर अंडे को मिड-डे-मील में शामिल करने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह तेजी से बढ़ता कारोबार है. देश की जीडीपी में अहम रोल निभाता है. एक्सपोर्ट बढ़ेगा तो विदेशी मुद्रा भंडार में भी इजाफा होगा. वहीं बैकयार्ड पोल्ट्री की मदद से किसानों की इनकम दोगुनी हो जाएगी.
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यूपी पोल्ट्री एसोसिएशन के अध्यक्ष नवाब अकबर अली का कहना है कि बीते कुछ साल में मुर्गियों के फीड में शामिल बाजरा, सोयाबीन और मक्का की एमएसपी तय कर दी गई है. एक मुर्गी को रोजाना औसत 125 ग्राम दाने की जरूरत होती है. अब हुआ यह कि व्यापारी ने किसान से तो औने-पौने दाम में तीनों चीजें खरीद लीं. क्योंकि सौ फीसद कोई भी फसल एमएसपी पर नहीं बिकती है. अब होता यह है कि जब पोल्ट्री फार्मर बाजार में दाना खरीदने जाता है तो वही कारोबारी एमएसपी का हवाला देते हुए महंगे दामों पर बाजरा, सोयाबीन और मक्का बेचते हैं. अब तो मक्का के इथेनॉल में शामिल हो जाते के बाद से पोल्ट्री फीड और महंगा हो गया है.
यूपी के पोल्ट्री एक्सपर्ट मनीष शर्मा का कहना है कि पोल्ट्री कारोबार कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं से घिरा हुआ है. कोरोना फैले या बर्ड फ्लू, लेकिन निशाना सबसे पहले पोल्ट्री बाजार बनता है. अंडे-मुर्गों की बिक्री बंद हो जाती है. बर्ड फ्लू के दौरान मुर्गियों को मारने के सरकारी फरमान जारी हो जाते हैं. मौसम की मार भी सबसे ज्यादा इस सेंसेटिव बर्ड पर पड़ती है. जबकि आज इस कारोबार को थोड़ी सी भी मदद मिले तो यह रफ्तार भरने लगेगा. दूसरा यह कि अंडे का कारोबार सीजन पर निर्भर है. जनवरी में अंडा छह रुपये का बिक जाता है तो जून, जुलाई-अगस्त में यही अंडा साढ़े तीन रुपये से चार रुपये के बीच बिकने लगता है. क्योंकि फरवरी के बाद सितम्बर तक अंडे की खपत कम हो जाती है. अगर अंडा मिड-डे-मील में शामिल हो जाए तो उसे साल के 12 महीने के लिए एक जैसा बाजार मिल जाएगा.
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