प्रतीकात्मक फोटो.पीएम नरेन्द्र मोदी ने लालकिले से दूसरी बातों के अलावा ब्ल्यू इकोनॉमी पर भी बात की. लेकिन ये कोई पहला मौका नहीं था जब वो ब्ल्यू इकोनॉमी को बढ़ावा देने या उसके बढ़ने की बात कर रहे हों. पहली बार पीएम बनने के बाद भी उन्होंने ब्ल्यू इकोनॉमी की बात की थी. इसी के चलते उन्होंने 20 हजार करोड़ रुपये की प्रधानमंत्री मस्त्य संपदा योजना (PMMSY) शुरू की थी. अगर आज फिर वो ब्ल्यू इकोनॉमी पर बात कर रहे हैं तो उसके पीछे भी बड़ी वजह है. आज देश की नजर 190 बिलियन डॉलर वाले सीफूड बाजार के 20 फीसद हिस्से पर है.
भारतीय झींगा की डिमांड लगातार बढ़ रही है. यूरोपीय देशों में भी हमारा झींगा खूब पसंद किया जा रहा है. सीफूड एक्सपोर्ट में एक बड़ा हिस्सा आज भी झींगा का ही है. फिशरीज न्यूट्रीशन सिक्योरिटी, हैल्दी और सस्ता प्रोटीन देने वाला सेक्टर है. इसलिए ये तेजी से बढ़ रहा है. जबकि भारत में तो दुनियाभर में पसंद की जाने वाली महंगी टूना मछली की भरमार है. फिशरीज सेक्टर में क्लस्टर मॉडल अपने की सलाह दी जा रही है. एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए ही मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (MPEDA) मछली से बने प्रोडक्ट तैयार करने पर जोर दे रही है.
सीफूड उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है. अगर इनलैंड मछली उत्पादन की बात करें तो आंकड़ा चीने को भी पीछे छोड़ने को तैयार है. मछली और दूसरे प्रोडक्ट के उत्पादन की बात करें तो आंकड़ा दो लाख टन से कुछ ही कदम दूर है. सीफूड एक्सपोर्ट का आंकड़ा 62 हजार करोड़ रुपये बढ़कर 70 हजार करोड़ रुपये को पार कर चुका है.
आज भी अमेरिका, चीन और यूरोप हमारे बड़े खरीदार देशों में हैं. गौरतलब रहे साल 2013–14 में 30,213 करोड़ का एक्सपोर्ट हुआ था, जो बढ़कर 2025–26 में 70 हजार करोड़ रुपये का हो गया है. इसमे भी एक बड़ी हिस्सेदारी झींगा एक्सपोर्ट की है. लेकिन सरकार का मकसद इस आंकड़े को एक लाख करोड़ रुपये तक ले जाने का है. इसके लिए सरकार रेडी-टू-ईट, रेडी-टू-कुक और वैल्यू एडिशन पर काम कर रही है.
केन्द्र सरकार का कहना है कि एक्सपोर्ट के आंकड़े को एक लाख करोड़ तक पहुंचाने के लिए भारत मूल्य-वर्धित समुद्री खाद्य निर्यात को बढ़ाएगा और ईईजेड तथा खुले समुद्र से समुद्री क्षमता का पूरा इस्तेमाल करेगा. बेहतर ऑनबोर्ड हैंडलिंग, मजबूत कोल्ड चेन, बेहतर पैकेजिंग, मूल्य संवर्धन तथा फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने और निर्यात तंत्र को मजबूत करने के लिए वैकल्पिक बाजारों की खोज की जाएगी. वहीं सीफूड एक्सपोटर्स को ईआईसी, एनसीडीसी, नाबार्ड और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय जैसी संस्थाओं का पूरा सहयोग मिलेगा. समुद्री केज कल्चर, मोती की खेती और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाजों के क्षेत्रों में निवेश में तेजी आई है.
देश में मछली उत्पादन 190 लाख टन से ऊपर पहुंच गया है. झींगा उत्पादन भी लगातार बढ़ रहा है. सीफूड एक्सपोर्ट 70 हजार करोड़ से ज्यादा का हो चुका है. यही वजह है कि अब देश की नजर वर्ल्ड के इंटरनेशनल सीफूड बाजार पर है. फिशरीज एक्सपर्ट की मानें तो विश्व में मछली से बने आइटम (वैल्यू एडेड प्रोडक्ट) का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. अभी ये बाजार करीब 190 बिलियन डॉलर का है. भारत की इसमे आठ बिलियन डॉलर की हिस्सेदारी है. जबकि देश का टॉरगेट अब कुल बाजार का 20 फीसद हिस्सा है.
फिशरीज डिपार्टमेंट से जुड़े एक्सपर्ट की मानें तो प्लान के मुताबिक साल 2030 तक फिश वैल्यू एडेड प्रोडक्ट को डबल से भी ज्यादा करने के लिए अभी चार साल बाकी हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए प्लान बनाया गया है. इसके लिए सबसे पहले तो बुनियादी ढांचा तैयार करने, प्रोडक्ट उत्पादन की क्षमता बढ़ाने और लेबर को ट्रेनिंग देने का काम चल रहा है. विदेशी एक्सपर्ट से भी लेबर को ट्रेनिंग दिलाई जा रही है. पहले दौर की ट्रेनिंग के लिए एक्सपर्ट के तौर पर वियतनाम से ट्रान क्वोक सोन और चू थी तुयेट माई को बुलाया गया था. लेबर को 22 तरह के प्रोडक्ट तैयार करने की ट्रेनिंग दिलाई जा रही है.
सीफूड एक्सपोर्टर ने एमपीडा से मांग करते हुए कहा है कि मौजूदा वक्त में सीफूड तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले तमाम आइटम फीस के साथ इंपोर्ट किए जा रहे हैं. मछली से तैयार होने वाले आइटम के लिए ब्रेड क्रम्ब्स, सॉस, प्री-डस्ट और प्लास्टिक ट्रे की जरूरत होती है. इसलिए ऐसे आइटम पर से इंपोर्ट डयूटी हटाई जाए. साथ ही उनका कहना है कि वैल्यू एडेड प्रोडक्ट के एक्सपोर्ट को बढ़ाने के लिए ये भी जरूरी है कि इंपोर्ट की एफओबी डयूटी में छूट को बढ़ाया जाए.
भारत से फिश एक्सपोर्ट लगातार बढ़ रहा है. लेकिन अब हमारी नजर मछली से बने आइटम (वैल्यू एडेड प्रोडकटो) पर है. विश्व में मछली से बने आइटम का 190 बिलियन डॉलर का कारोबार है. इसमे भारत की हिस्सेदारी आठ बिलियन डॉलर की है. लेकिन साल 2030 तक हम इसे दोगुना कर लेंगे. हमारा निशाना 20 फीसद की हिस्सेदारी हासिल करने पर है. भारतीय समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीडा) ने इसके लिए प्लान तैयार कर उस पर काम भी शुरू कर दिया है. सामने चीन, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों की चुनौती है, लेकिन हम 20 फीसद के टॉरगेट को हासिल कर लेंगे. इसके लिए प्रोसेसिंग के काम में लगी लेबर को विदेशी एक्सपर्ट से क्वालिटी के आइटम तैयार करने की ट्रेनिंग दिलाई जा रही है.
फिशरीज सेक्टर को "सनराइज सेक्टर" भी कहा जाता है. एक्सपर्ट के मुताबिक फिशरीज न्यूट्रीशन सिक्योरिटी, हैल्दी और सस्ता प्रोटीन देने वाला सेक्टर है. इतना ही नहीं ये सेक्टर तीन करोड़ से ज्यादा लोगों को सीधे रोजगार भी देता है. यही वजह है कि आज हमारा देश फिशरीज सेक्टर में मछली उत्पादन करने वालों में दूसरे स्थान पर आ गया है. विश्व के कुल मछली उत्पादन का 8 फीसद उत्पादन हमारे देश में हो रहा है. वहीं भारत सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक भी है. अगर स्त्रोत की बात करें तो हमारे देश में 11 हजार किमी से ज्यादा का कोस्टल एरिया है.
मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, मार्केट एक्सेस, टेक्नोलॉजी अपनाने, ट्रेसबिलिटी और जलवायु-लचीली मत्स्य पालन प्रणालियों पर फोकस किया जा रहा है. इसी के तहत सरकार ने गहरे समुद्र में मछली पकड़ने, कोल्ड चेन इंटीग्रेशन, प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट यूनिट्स को लिस्ट में शामिल किया है. साथ ही आधुनिक लैंडिंग और फसल कटाई के बाद का इंफ्रास्ट्रक्चर, नदी रैंचिंग और हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों में ट्राउट फार्मिंग और हैचरी नेटवर्क के माध्यम से ठंडे पानी की मत्स्य पालन को बढ़ावा देना शामिल है. सरकार ने गहरे समुद्र में मछली पकड़ने, कोल्ड चेन इंटीग्रेशन, प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट यूनिट्स का इस्तेमाल करते हुए वित्त वर्ष 2025-26 तक राष्ट्रीय मछली उत्पादन को 220 लाख टन तक बढ़ाने का एक लक्ष्य रखा है.
विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) से जुड़ी चर्चा पूरी तरह अंडमान-निकोबार और लक्षदीप क्षेत्र की मत्स्य संपदा के टिकाऊ दोहन से जुड़ी है. हाल ही में मत्स्य विभाग ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को टूना क्लस्टर घोषित किया है. यहां करीब 6 लाख वर्ग किलोमीटर का ईईजेड है. बजट में इस चर्चा के बाद फिश एक्सपोर्ट को लेकर कई उम्मीदें लगाई जा रही हैं.
महंगी मछलियों में शामिल टूना के भंडार को देखते हुए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को टूना क्लस्टर घोषित किया है. इसका फायदा कोस्टल एरिया में रहने वाले मछुआरों को मिलेगा. इंटरनेशनल फिश मार्केट में भी टूना मछली की बहुत डिमांड है. इसके चलते खासतौर पर एशियाई देशों में एक मजबूत फिश मार्केट मिलेगा. ये इलाका खासतौर से टूना और टूना जैसी हाई वैल्यू वाली प्रजातियों से भरा हुआ है. एक अनुमान के मुताबिक यहां करीब 60 हजार मीट्रिक टन टूना मछली है. यहां से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की नजदीकी समुद्री और हवाई कारोबार के मौकों को मजबूत बनाती है.
मछली पालन के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) जिसे 2018-19 में पेश किया गया था, अल्पकालिक परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सबसे सुलभ साधन के रूप में उभरा है. जून 2025 तक 4.76 लाख KCC जारी किए जा चुके हैं, जिसमें 3214 करोड़ रुपये वितरित किए गए हैं. PM-MKSSY कंपोनेंट 1A के तहत, डॉक्यूमेंटेशन और प्रोसेसिंग खर्चों को पूरा करने के लिए उधार लेने वालों को "सक्सेस फीस" के तौर पर 5 हजार रुपये तक का एक बार का पोस्ट-डिस्बर्समेंट इंसेंटिव भी दिया जाता है.
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