सीआईआरजी अपना 45वां स्थापना दिवस मना रहा है.चारागाह कम होते जा रहे हैं. हरा चारा और भूसा दिन-बा-दिन महंगा हो रहा है. इतना ही नहीं अब तो शहर में ही नहीं गांवों में भी बकरे-बकरियों को खुले में चराना मुश्किल होता जा रहा है. लेकिन बकरे-बकरियों की अच्छी ग्रोथ के लिए जरूरी है कि उन्हें पौष्टििक खुराक मिले. इस तरह की परेशानी अक्सर ऐसे बकरी पालकों के सामने आती है जो खासतौर से बकरीद पर बेचने के लिए बकरे पालते हैं. गोट एक्सपर्ट का कहना है कि अगर बकरे-बकरियों को अच्छी खुराक मिले तो उन्हें खूंटे पर बांधकर और छत पर रखकर भी पाला जा सकता है.
कई ऐसी नस्ल हैं जो बकरीद पर भी पसंद की जाती हैं और उन्हें खूंटे पर बांधकर भी पाला जा सकता है. केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (CIRG), मथुरा ने एक खास पैलेट फीड बनाया है. इस पैलेट फीड की मदद से स्टॉल फीड यानि घर पर पलने वाले बकरे भी हेल्दी बन सकते हैं.
गोट एक्सपर्ट और साइंटिस्ट डॉ. रविन्द्र का कहना है कि शहर में बकरा-बकरी पालन करना अब कोई मुश्किल काम नहीं है. ये कोई जरूरी नहीं है कि बकरों को फार्म और घर में रखकर सूखे, हरे और दानेदार चारे का अलग-अलग इंतजाम किया जाए. सीआईआरजी ने चारे की फील्ड में कई ऐसी रिसर्च की है कि जिसके बाद आपको बकरे के लिए तीन तरह के अलग-अलग चारे का इंतजाम करने की जरूरत नहीं है.
संस्थान के साइंटिस्ट ने हरे, सूखे और दाने वाले चारे को मिलाकर पैलेट्स फीड तैयार किया है. जरूरत के हिसाब से बकरे और बकरियों के सामने पैलेट्स रख दिजिए, जब पानी का वक्त हो जाए तो पानी पिला दिजिए. इसके अलावा कुछ और न खिलाने की जरूरत है और न ही पिलाने की.
सीआईआरजी के सीनियर साइंटिस्ट और बरबरी नस्ल के एक्सपर्ट एमके सिंह का कहना है कि बरबरी नस्ल को शहरी बकरी भी कहा जाता है. अगर आपके आसपास चराने के लिए जगह नहीं है तो इसे खूंटे पर बांधकर या छत पर भी पाला जा सकता है. अच्छा चारा खिलाने से इसका वजन नौ महीने का होने पर 25 से 30 किलो, एक साल का होने पर 40 किलो तक हो जाता है. अगर सिर्फ मैदान या जंगल में चराई पर ही रखा जाए तब भी एक साल का बकरा 25 से 30 किलो का हो जाता है.
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