झींगा तालाब का प्रतीकात्मक फोटो.अगर आप मछलियों के तालाब में नजर दौड़ाएंगे तो कुछ मछलियां आपको मोटी ताजी दिखाई देंगी और कुछ मछलियां एकदम कमजोर. यही वजह है कि बाजार में मछलियों के सही दाम नहीं मिल पाते हैं. लेकिन ये परेशानी किसी दो-चार मछली पालकों की नहीं है, ज्यादातर मछली पालक इस परेशानी से जूझते रहते हैं. अगर फिशरीज एक्सपर्ट की मानें तो इस परेशानी की वजह खुद मछली पालक हैं. और इसका समाधान भी उन्हीं के हाथ में है. क्योंकि जब मछली पालक तालाब में फीड डालते हैं तो वो सही तरीके से मछलियों तक नहीं पहुंच पाता है.
यही वजह है कि कुछ मछलियां तो भरपेट दाना खा लेती हैं, जबकि कुछ मछलियों को पूरा दाना नहीं मिल पाता है और वो भूखी रह जाती हैं. और होता ये है कि भूखी रह जाने वाली मछलियां ही कमजोर रह जाती है. फिशरीज एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए मछलियों को तालाब में ड्रोन की मदद से दाना खिलाना चाहिए. इससे होगा ये कि मछली तालाब के किसी भी हिस्से में हो, लेकिन उसे दाना अपनी ही जगह पर मिल जाएगा. जबकि हाथ से दाना तालाब में डालने पर वो सिर्फ किनारे पर ही रह जाता है.
मछली पालक संजय कुमार का कहना है कि बाजार में रोहू मछली बहुत पसंद की जाती है. इसके मीट में बहुत स्वा द होता है. इसका मीट नरम भी होता है. यूपी, दिल्लीछ-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थाेन में रोहू की डिमांड पूरी करने के लिए तालाबों में रोहू मछली खूब पाली जाती है. जब तालाब में मछलियों के लिए दाना डाला जाता है तो रोहू तालाब की तली से दो फुट ऊपर और तालाब की सतह से दो फुट नीचे बीच में आकर दाना खाती है.
नरेन मछली को नॉर्थ इंडिया में नैनी के नाम से भी जाना जाता है. पेट भरने के लिए नैनी तालाब के तले में रहकर ही इंतजार करती है. बेशक मछली पालक दाना डालने में कितनी ही देर कर दे, लेकिन नैनी तालाब की सतह पर जाकर दाने की तलाश नहीं करती है. वैसे भी नैनी को तालाब की तली में ही रहना ज्याबदा पसंद है.
नॉर्थ इंडिया में रोहू के बाद खाने के लिए अगर किसी और मछली को पसंद किया जाता है तो वो कतला है. फिश फ्राई में भी कतला मछली का खासा चलन है. बाजार में एक से डेढ़ किलो वजन की कतला मछली हाथों-हाथ बिकती है. लेकिन अपना पेट भरने के लिए कतला तालाब की सतह पर ही रहकर इंतंजार करती है.
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