मुर्गी पालकों को सर्दियों में खास ध्यान रखना चाहिए (Photo: Pexels)अंडे देने वाली मुर्गी हो या फिर चिकन के लिए तैयार किया गया मुर्गा, दोनों के बीच एक बीमारी बहुत ज्यादा पाई जाती है. और वो बीमारी हैं पेट संबंधी. मुर्गे-मुर्गियों में सबसे ज्यादा पेट संबंधी बीमारियां ही होती हैं. और ये वो बीमारी हैं जो उत्पादन को प्रभावित करती हैं. पोल्ट्री एक्सपर्ट की मानें तो मुर्गे-मुर्गियों को होने वालीं पेट संबंधी बीमारियों की कई वजह होती हैं. लेकिन जो सबसे खास और बड़ी वजह है वो उन्हें खिलाया जाने वाला फीड और पीने को दिया जाने वाला पानी है.
हालांकि ये सुनने में बड़ा अजीब लगता है कि जिस फीड-पानी से जीवन मिलता है और ग्रोथ होती है तो वो कैसे जानलेवा हो सकता है. एक्सपर्ट के मुताबिक पोल्ट्री फार्म से निकला कचरा और खाद का सही तरह से निपटान न होना भी कर्मचारियों और पक्षियों की सेहत पर असर डलता है. वहीं प्रोडक्ट की क्वालिटी भी खराब हो जाती है. अंडे-चिकन के दाम भी अच्छे नहीं मिलते हैं. और इस सब के चलते होता ये है कि पोल्ट्री फार्म की लागत बढ़ जाती है.
मुर्गियों को खराब और फफूंद लगा पोल्ट्री फीड खाने को न दें.
नमी और मुर्गियों के मल के संपर्क में आए फीड को फौरन हटा दें.
फार्म से निकले खराब फीड को मिट्टी में दबा दें या खाद बना लें.
पोल्ट्री फार्म के आसपास गंदी पानी जमा न होने दें.
फार्म से निकले गंदे पानी को किसी गड्ढे या नाली में बहा दें.
फार्म के अंदर पानी जमा न होने दें, इससे मक्खी और मच्छर पैदा होते हैं.
जल प्रदूषण से बचने के लिए फार्म ऊंचे चबूतरे या कंक्रीट के फर्श पर बनाएं.
जहां पानी जमा हो या स्टोर किया जाता है वहां गोबर जमा न करें.
पोल्ट्री फार्म से निकले कचरे का निपटान करते वक्त दस्ताने और जूते पहनें.
खाद और मरी हुई मुर्गियों को निपटाने के बाद हाथ धोकर ही दूसरे काम करें.
मरी हुई मुर्गियों को फार्म से दूर जमीन में गहरा गड्ढा कर दबा दें.
मरी हुई मुर्गियों को जलाना मुमकिन हो तो जला दें.
मरी हुई मुर्गियों को कभी भी खुले मैदान या तालाब-नदी में न फेंके.
मरी हुई मुर्गियों के निपटान में इस्तेमाल होने वाले उपकरण कीटाणु रहित कर लें.
फार्म में जहां कचरा और खाद जमा होती है वहां हर किसी को न जानें दें.
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