बाजार में जमनापारी और जखराना बकरे-बकरियों की डिमांड बढ़ गई है. फोटो क्रेडिट-किसान तकमौसम कोई भी हो, लेकिन जन्म के साथ ही बकरी के बच्चों के लिए परेशानी खड़ी हो जाती है. सबसे पहले तो निमोनिया अपनी चपेट में लेता है. अगर निमोनिया से बचे तो संक्रमण के अटैक का खतरा बना रहता है. क्योंकि भेड़-बकरियों में री-प्रोडक्शन यानि प्रजनन को बड़े मुनाफे के तौर पर देखा जाता है तो बच्चों की देखभाल फिर बहुत मायने रखती है. यही वजह है कि गोट एक्सपर्ट जन्म से पहले और जन्म के बाद बकरी और उसके बच्चों की देखभाल बहुत जरूरी बताते हैं. इसके लिए एक्सपर्ट की ओर से टिप्स भी दिए जाते हैं. उत्पादन करने वाला पशु गाय-भैंस हो या भेड़-बकरी, सभी का अर्थशास्त्र बच्चा देने पर ही टिका होता है.
इसलिए ये जरूरी हो जाता है कि बच्चों की मृत्यु दर को रोका जाए या फिर कम किया जाए. क्योंकि बकरी पालन मीट और दूध दोनों के लिए किया जाता है. इसलिए दोनों में ही मुनाफे के लिए ये जरूरी है कि बकरी साल में दो बार जो दो-दो बच्चे देती है वो जिंदा रहें. अगर एक्सपर्ट की बताई गईं छोटी-छोटी बातों पर काम करके जन्म लेने वाले बच्चों की मृत्यु दर को कम किया जा सकता है.
गोट एक्सपर्ट का कहना है कि बकरी के बच्चों की मृत्यु् दर कम करने के लिए ये जरूरी है कि हम उसकी देखभाल के साथ ही उसके खानपान का भी ध्यान रखें. उम्र के साथ उसका वैक्सीनेशन भी कराएं.
अगर आप साइंटीफिक तरीके से बकरी पालन कर रहे हैं तो फिर बकरी अपने शेड में अक्टूबर-नवंबर में बच्चा देगी या फिर मार्च-अप्रैल में. ये मौसम का वो वक्त है जब ना तो ज्यादा गर्मी होती है और ना ही ज्यादा सर्दी. बावजूद इसके बकरी के बच्चे को उचित देखभाल की जरूरत होती है.
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