पेरियार गाय को मिला देसी नस्ल का दर्जा (सांकेतिक तस्वीर-AI Generated)बीमारी कोई भी हो जैसे ही वो पशुओं को अपनी चपेट में लेती है तो उसका सबसे पहला असर उत्पादन पर पड़ता है. खुरपका-मुंहपका (FMD) बीमारी की बात करें तो ये और भी खतरनाक हो जाती है. क्योंकि ये वो बीमारी है जिसके चलते पशुओं की मौत तक हो जाती है. ऐसे में बड़े पशुओं को एफएमडी से बचाने के साथ-साथ बछड़ों को बीमारी से दूर रखना और ज्यादा जरूरी हो जाता है. हालांकि एनिमल एक्सपर्ट के मुताबिक एफएमडी बछड़ों पर कम ही अटैक करती है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बछड़े इसकी चपेट में ही नहीं आते हैं.
लेकिन जब बछड़े इस बीमारी की चपेट में आते हैं तो उन्हें बहुत ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है. एफएमडी के खासतौर पर सर्दियों और बरसात में होने की आशंका ज्यादा रहती है. इसलिए बछड़ों के शेड में ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. इस बीमारी के चलते पशुओं को तो परेशानी होती ही है, साथ में पशु के इलाज पर खर्च होता है और उत्पादन घटता है तो उसका नुकसान अलग से.
एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि FMD अगर बछड़ों में होती है तो वो उनके हॉर्ट को भी प्रभावित करती है. ऐसा होने पर बछड़ों की मौत तक हो जाती है. इसलिए जहां भी FMD संक्रमण फैला हो या फैलने की आशंका हो तो वहां बछड़ों की खास देखभाल करनी चाहिए. अगर बछड़ों में लक्षण दिखाई दें तो बछड़ों के शेड में भी दवाई का छिड़काव जरूरी हो जाता है. संक्रमण फैलते ही तेज बुखार के साथ मुंह और पैर में छाले हो जाते हैं. ऐसे कुछ लक्षण दिखाई देने पर फौरन ही शेड में ये जरूरत काम शुरू कर देने चाहिए.
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