Sheep-Lamb Disease: भेड़ और उसके बच्चों की जान तक चली जाती है इन 2 बीमारियों की वजह से 

Sheep-Lamb Disease: भेड़ और उसके बच्चों की जान तक चली जाती है इन 2 बीमारियों की वजह से 

Sheep-Lamb Disease भेड़ अचानक से चलते-चलते लड़खड़ाने लगे. उसे तेज बुखार आ रहा हो. लेकिन जब तक इसका इलाज शुरू होता है तब तक भेड़ की मौत हो जाती है. इलाज कराने का मौका तक नहीं मिलता है. बच्चे यानि मेमनों में भी जब हगलू बीमारी फैलती है तो वो कमजोर हो जाते हैं. और फिर खूनी दस्त के साथ उनकी मौत होने लगती है. 

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Sheep-Lamb Disease: भेड़ और उसके बच्चों की जान तक चली जाती है इन 2 बीमारियों की वजह से भेड़ पालन से जुड़ी बातें

हगलू और फुट रोट का नाम आते ही छोटा-बड़ा कैसा भी भेड़ पालक हो वो घबरा जाता है. भेड़ पालक को अगर ये पता चल जाए कि उसके झुंड में किसी भेड़ को हगलू या फुट रोट बीमारी हो गई है तो उसकी परेशानी बड़ जाती है. उसे अपनी सभी भेड़ों पर मौत का खतरा मडराता हुआ नजर आता है. क्योंकि शीप एक्सपर्ट की मानें तो हगलू और फुट रोट नाम की दोनों बीमारियां भेड़ों के लिए जानलेवा हैं. ये बड़ी भेड़ और उसके बच्चों दोनों को चपेट में ले लेती है. भेड़ साल में दो बार बच्चे देती है. ज्यादातर मामलों में तीन से चार बच्चे तक देती है. 

इस तरह से भेड़ एक साल में छह से आठ तक दे देती है. लेकिन कुछ ऐसी बीमारियां हैं जो मेमनों पर अटैक करती हैं. इसलिए ये जरूरी हो जाता है कि मेमनों को जानलेवा बीमारियों हगलू और फुट रोट से बचाने के उपाय किए जाएं. हालांकि दोनों ही बीमारी का इलाज नहीं है. सिर्फ पशु चिकित्सक की सलाह पर टीकाकरण और कुछ सुरक्षात्मक उपाय अपना ही इसकी रोकथाम कर भेड़ और मेमनों को मरने से बचाया जा सकता है. 

हगलू बीमारी से कैसे करें बचाव 

  • भेड़ पालक एन्टीरोटोक्सीमिया बीमारी को हगलू नाम से जानते हैं. 
  • यह बीमारी ज्यादातर जीवाणुओं द्वारा फैलती है. 
  • यह जीवाणु खासतौर भेड़ के पेट के अन्दर होता है. 
  • इस बीमारी में भेड़ में तेज पेट दर्द होता है. 
  • अधिकतर छोटे बच्चों में ये बीमारी ज्यादा देखी जाती है. 
  • इस बीमारी के होने पर पशु धीरे-धीरे कमज़ोर हो जाता है. 
  • कई बार उसे तेज चक्कर भी आने लगते हैं.
  • मुंह से झाग निकलते हैं और दस्त के साथ खून भी आता है.
  • प्राथमिक उपचार के तौर पर नमक-चीनी का घोल पिलाना चाहिए. 
  • घोल दस्त के कारण पशु के शरीर में हुई पानी की कमी को पूरा करता है. 
  • इसके साथ-साथ पेट के कीड़ों की दवाई भी भेड़ों के झुंड को पिलानी चाहिए. 
  • घास चरने की जगह समय-समय पर बदलनी चाहिए. 
  • दस्त और बुखार को कम करने के लिए पशु चिकित्सक के मुताबिक इलाज कराएं. 
  • बीमारी से बचाव के लिए साल में एक बार टीकाकरण करवाना चाहिए.

ये हैं फुट रोट से बचाव के तरीके 

  • भेड़ पालक फुट रोट बीमारी को चिकड़ नामक रोग से जानते हैं. 
  • यह बीमारी जीवाणुओं द्वारा होती है. 
  • इस बीमारी में भेड़ के खुरों की बीच की चमड़ी पक जाती है. 
  • भेड़ लंगडी हो जाती है और उसे तेज़ बुखार हो जाता है. 
  • इस बीमारी के जीवाणु मिटटी द्वारा एक जानवर से दूसरे में चले जाते है. 
  • यह एक छूत का रोग है, जो एक भेड़ से पूरे झुंड में फैला जाता है.
  • इस रोग से बीमार भेड़ को अपने झुंड में ना लाऐं. 
  • जिस रास्ते से इस बीमारी वाला कोई झुंड गुजरा हो उस रास्ते से अपने झुंड को न ले जाएं. 
  • कम से कम 7 से 8 दिन तक उस रास्ते पर अपने झुंड को लेकर न जाएं. 
  • बीमार भेड़ के खुरों की हमेशा सफाई रखें. 
  • भेड़ों के खुरों को नीले थोथे (कापर सल्फेट) के घोल से धोऐं. 
  • भेड़ों के खुर में जख्म हो तो वहां एन्टीवायोटिक मलहम लगाएं. 
  • चिकित्सक की सलाह अनुसार चार-पांच दिनों तक एन्टीवायोटिक इन्जेक्शन लगाऐं. 

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