पशुओं में बढ़ रहा इस संक्रमण का खतराकई बार ऐसा होता है कि गाय-भैंस पहला या फिर पहला और दूसरा बच्चा देने के बाद तीसरा बच्चा वक्त से नहीं देती है. हीट में तो आती है लेकिन गाभिन नहीं होती है. कई बार ऐसा भी होता है कि साइलेंट हीट में आने के चलते पता ही नहीं चलता है कि कब हीट में आई. जबकि हर एक पशुपालक की यही चाहत होती है कि उसकी गाय या भैंस हर साल वक्त से बच्चा दे दे. क्योंकि जब वक्त से बच्चा होता होगा तो दूध भी देगी और बोनस के रूप में बच्चा मिलेगा. लेकिन कभी-कभी कई तरह की रुकावट आ जाती हैं. गाय-भैंस बच्चा देने में गैप कर देती हैं. कई बार तो ये गैप दो से तीन साल का भी हो जाता है.
जिसके चलते पशुपालन की लागत भी बढ़ जाती है. क्योंकि बच्चा नहीं होगा तो दूध उत्पादन नहीं होगा, लेकिन खुराक पूरी खिलानी होगी. अगर एनिमल एक्सपर्ट की मानें तो इस परेशानी का इलाज घर पर संभव है. Ethnoveterinary practices (EVP) परंपरागत पशु चिकित्सा पद्ति से इसका इलाज किया जा सकता है. नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड (NDDB) भी EVP का प्रचार कर रहा है. केवीके, रामगिरि खिला, जिला पेद्दापल्ली, तेलंगाना एनिमल एक्सपर्ट के मुताबिक गाय-भैंस का गर्भधारण सुनिश्चित करने के लिए ये पूरी तरह से स्वदेशी ज्ञान पर आधारित है.
मूली, एलोवेरा, सिसस, करी पत्ता, नमक, गुड़ हल्दी पाउडर और मोरिंगा के पत्ते इलाज में बहुत मददगार होते हैं. लेकिन ये जानना भी जरूरी है कि पत्तों और नमक-गुड़ का इस्तेमाल कैसे किया जाए.
एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि बांझपन जितना पुराना होगा तो उसके इलाज में उतनी ही परेशानी आएगी. इसलिए सही समय पर पशुओं की जांच कराएं. अगर भैंस दो से ढाई साल में हीट पर नहीं आती है तो ज्यादा से ज्यादा दो से तीन महीने ही इंतजार करें, अगर फिर भी हीट में नहीं आती है तो फौरन अपने पशु की जांच कराएं. इसी तरह से गाय के साथ है. अगर गाय डेढ़ साल में हीट पर न आए तो उसे भी दो-तीन महीने इंजार के बाद डॉक्टर से सलाह लें.
कई मामले ऐसे भी होते हैं कि एक बार बच्चा देने के बाद भी बांझपन की शिकायत आती है. इसलिए अगर गाय-भैंस एक बार बच्चा देती है तो दोबारा उसे गाभिन कराने में देरी न करें. आमतौर पर पहली ब्याहत के बाद दो महीने का अंतर रखा जाता है. लेकिन इस अंतर को ज्यादा रखें. अंतर जितना ज्यादा रखा जाएगा बांझपन की परेशानी बढ़ने की संभावना उतनी ही ज्यादा हो सकती है.
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