
साल 2026 में हिंदुस्तानी मॉनसून का मिजाज किसी बड़ा यू टर्न जैसा रहा है, जिसने जून की तपिश से लेकर जुलाई की मूसलाधार बारिश तक कई बड़े उतार-चढ़ाव दिखाए हैं. अलनीनो के तगड़े असर की वजह से जून के महीने में मानसून की रफ्तार बेहद सुस्त थी, जिसके चलते 29 जून 2026 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में खरीफ की बुवाई सिर्फ 182.72 लाख हेक्टेयर में ही हो सकी थी. यह रकबा पिछले साल की इसी अवधि 236.46 लाख हेक्टेयर के मुकाबले लगभग 23% कम था.
मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 30 जून 2026 तक पूरे देश में सिर्फ 99.5 MM बारिश दर्ज की गई थी, जबकि आम तौर पर इस दौरान 165.3 MM सामान्य बारिश होनी चाहिए थी.यानी जून के पूरे महीने में सामान्य से करीब -40% कम पानी बरसा, जिसने किसानों के चेहरे पर मायूसी ला दी थी. लेकिन जुलाई का पहला हफ्ता आते ही मौसम ने ऐसी करवट बदली कि पासा ही पलट गया.1 जुलाई से 8 जुलाई 2026 के बीच आसमान से ऐसी मूसलाधार बारिश बरसी कि सूखे के सारे पुराने रिकॉर्ड पलक झपकते ही खत्म हो गए और खेतों को नई जिंदगी मिल गई .
जून के शुरुआती और मध्य हफ्तों में कई राज्यों में सूखे जैसे बेहद खराब हालात पैदा हो गए थे, जिसने मौसम वैज्ञानिकों और किसानों दोनों की रातों की नींद उड़ा दी थी.खासकर मध्य जून 17 जून 2026 तक के साप्ताहिक आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में सामान्य से -65%, गुजरात रीजन में -100% यानी पूरी तरह सूखा और मध्य महाराष्ट्र में 99% जैसी ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई थी. पानी की भारी किल्लत और हाहाकार के बीच फसलों की बुवाई पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गई थी.उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े कृषि प्रधान राज्यों का हाल भी कुछ ऐसा ही था.
जून के अंत तक उत्तर प्रदेश में सामान्य 95.9 MM के मुकाबले सिर्फ 47.6 MM बारिश हुई, जो सामान्य से -50% कम थी.वहीं बिहार में भी जून के आखिर तक महज 87.2 MM बारिश रिकॉर्ड की गई, जो सामान्य 163.3 MM से लगभग -47% कम थी.इस सूखे ने धान की रोपाई और खरीफ फसलों के पूरे चक्र को संकट में डाल दिया था.
लेकिन अलनीनो के इस खौफनाक दौर के बीच, जुलाई के पहले हफ्ते 8 जुलाई 2026 तक के बाऱिश ने खेती की तकदीर बदल दी. इस एक हफ्ते में महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कुदरत का करिश्मा देखने को मिला. 8 जुलाई के साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार, मध्य महाराष्ट्र में जो सूखा जून में रुला रहा था, वहां जुलाई के पहले हफ्ते में सामान्य से +266% की भारी-भरकम और रिकॉर्डतोड़ बारिश दर्ज की गई। गुजरात रीजन में भी पासा पलटा और वहां सामान्य से +156% ज्यादा पानी बरसा, जबकि सौराष्ट्र और कच्छ के इलाके में भी +158% की भारी बारिश ने सूखे का नामोनिशान मिटा दिया. मध्य प्रदेश का हाल भी सुधर जहां पश्चिमी मध्य प्रदेश में सामान्य से +90% ज्यादा बारिश हुई, वहीं पूर्वी मध्य प्रदेश ने भी अपनी कमी को पूरा करते हुए सामान्य वर्षा स्तर हासिल कर लिया.
इस मूसलाधार बारिश ने उन राज्यों को सबसे बड़ी राहत दी है जहां धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. छत्तीसगढ़, जिसे देश में 'धान का कटोरा' कहा जाता है,जून के आखिरी हफ्ते 24 जून तक -67% के बड़े घाटे से जूझ रहा था. लेकिन 8 जुलाई के खत्म होने वाले हफ्ते में छत्तीसगढ़ में सीधे 100% की भारी बारिश दर्ज की गई, जिसने तालाबों और खेतों को पानी से लबालब भर दिया. इसके अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में,जहां धान की रोपाई पूरी तरह पानी की उपलब्धता पर टिकी होती है, वहां भी जुलाई की इसमॉनसूनी बारिश ने संजीवनी का काम किया.
लेकिन जुलाई के पहले हफ्ते में बादलों ने वापसी की कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में जूलाई में अब केवल समान्य से अब -37% ही कम रह गया जिसने सूखे के जख्मों पर मरहम लगा दिया.पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी 17% की संतोषजनक बढ़त रही. इसी तरह बिहार में भी 8 जुलाई वाले हफ्ते में हालांकि -65% का आंकड़ा दिखा.लेकिन जून के मुकाबले जुलाई की शुरुआती फुहारों बारिश के असर ने रोपाई के काम को रफ्तार दे दी.
इस साप्ताहिक विश्लेषण से साफ होता है कि साल 2026 का मानसून भले ही शुरुआत में बेहद कमजोर और डरावना रहा, लेकिन जुलाई के शुरुआती सात दिनों की मूसलाधार झमाझम ने भारतीय कृषि व्यवस्था को मंदी के दलदल से बाहर निकाल लिया है. महाराष्ट्र के कोंकण और गोवा इलाके में भी 8 जुलाई वाले हफ्ते में +108% की जोरदार बारिश दर्ज की गई। खेतों में जो रौनक पूरी तरह गायब हो चुकी थी और जहां बुवाई का काम रुक गया था, वह अब पूरी शिद्दत और उम्मीद के साथ दोबारा बहाल हो चुका है. भले ही इस भारी बारिश से कुछ निचले इलाकों में जलभराव और बाढ़ जैसी दिक्कतें सामने आई हैं, लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो इस मॉनसूनी ड्रामे का यह मोड़ हमारे किसानों और की देश खाद्य सुरक्षा के लिए एक बेहद सुखद और बेहतरीन मोड़ साबित हुआ है.