पहले हल-बैल से करती थीं खेती, अब पावर टिलर से लिख रहीं सफलता की नई कहानी

पहले हल-बैल से करती थीं खेती, अब पावर टिलर से लिख रहीं सफलता की नई कहानी

छत्तीसगढ़ के सुकमा की सोढ़ी तिरपो ने बिहान योजना और कस्टम हायरिंग सेंटर के प्रशिक्षण से हल-बैल छोड़ आधुनिक पावर टिलर अपनाया.जानिए कैसे आधुनिक खेती ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बना दिया.

धर्मेंद्र सिंह
  • Raipur ,
  • Jul 10, 2026,
  • Updated Jul 10, 2026, 10:12 AM IST

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में संचालित बिहान योजना ग्रामीण महिलाओं के जीवन में बदलाव की नई कहानी लिख रही है. यह योजना महिलाओं को केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ही नहीं बना रही, बल्कि उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़कर खेती में नई पहचान भी दिला रही है. विकासखंड कोंटा के ढोढरा गांव की महिला किसान सोढ़ी तिरपो इसकी प्रेरणादायक मिसाल हैं, जिन्होंने हल-बैल से खेती करने की पारंपरिक पद्धति को छोड़कर अब आधुनिक कृषि मशीनों के साथ खेती की नई शुरुआत की है.

हल-बैल से मशीन तक का सफर

कुछ समय पहले तक सोढ़ी तिरपो खेती के लिए हल-बैल और पारंपरिक कृषि उपकरणों पर निर्भर थीं. खेत की जुताई और अन्य कार्यों में अधिक समय और मेहनत लगती थी.आधुनिक कृषि यंत्रों का संचालन उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था.लेकिन आज वही सोढ़ी तिरपो पूरे आत्मविश्वास के साथ पावर टिलर चला रही हैं और अन्य किसानों को भी इसकी सुविधा उपलब्ध करा रही हैं.

प्रशिक्षण ने बदली सोच और बढ़ाया आत्मविश्वास

जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में तुलसी महिला ग्राम संगठन द्वारा संचालित कस्टम हायरिंग सेंटर में सोढ़ी तिरपो को पावर टिलर चलाने का प्रशिक्षण दिया गया.क्लस्टर पीआरपी पूजा कोड़ी के निरंतर मार्गदर्शन और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने मशीन संचालन की पूरी तकनीक सीखी. अब वे बिना किसी झिझक के कृषि यंत्रों का संचालन कर रही हैं और आधुनिक खेती की मिसाल बन चुकी हैं.

30 डिसमिल खेत में आधुनिक खेती से बढ़ा उत्पादन

सोढ़ी तिरपो अपने 30 डिसमिल खेत में मक्का और मिर्च की खेती आधुनिक तकनीकों से कर रही हैं. पावर टिलर के उपयोग से खेती का काम पहले की तुलना में काफी तेज, आसान और कम खर्चीला हो गया है.इससे न केवल समय की बचत हुई है, बल्कि खेती की लागत में कमी आने के साथ फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में भी सुधार देखने को मिला है.

छोटे किसानों के लिए बना सहारा कस्टम हायरिंग सेंटर

कस्टम हायरिंग सेंटर का लाभ केवल सोढ़ी तिरपो तक सीमित नहीं है.आसपास के छोटे और सीमांत किसान भी यहां से कम किराए पर आधुनिक कृषि यंत्र लेकर समय पर खेती कर रहे हैं.इस पहल से किसानों की लागत घट रही है, श्रम की बचत हो रही है और कृषि कार्य अधिक सुविधाजनक बन रहा है.

महिला सशक्तीकरण की बनी नई पहचान

आज सोढ़ी तिरपो केवल मशीन चलाने तक सीमित नहीं हैं. वे कृषि यंत्रों के रख-रखाव, संचालन और किसानों को समय पर सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं.उनकी सफलता ने गांव की अन्य महिलाओं में भी आत्मविश्वास जगाया है. अब कई महिलाएं आधुनिक खेती और कृषि मशीनों के संचालन का प्रशिक्षण लेने के लिए आगे आ रही हैं.

बिहान योजना ने खोले आत्मनिर्भरता के नए रास्ते

सोढ़ी तिरपो की सफलता यह साबित करती है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं का लाभ मिले तो वे खेती में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकती हैं.बिहान योजना और कस्टम हायरिंग सेंटर की पहल ने न केवल उनकी आजीविका को मजबूत किया है, बल्कि सुकमा जिले में महिला सशक्तीकरण और आधुनिक कृषि का एक सफल मॉडल भी प्रस्तुत किया है.

 

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