
झारखंड में इस साल मॉनसून की शुरुआत काफी कमजोर और सुस्त रही है, जिसने सूबे के तमाम किसानों को बेहद परेशान कर दिया है. मौसम विभाग (IMD) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून से 8 जुलाई 2026 तक पूरे राज्य में सामान्य के मुकाबले करीब 32 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है. इस गंभीर कमी की सबसे बड़ी वजह प्रशांत महासागर में सक्रिय 'अल नीनो' (El Niño) के असर को माना जा रहा है. अल नीनो की वजह से मानसूनी हवाओं की रफ्तार धीमी पड़ गई है, जिससे तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और उमस ने किसानों की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा दी हैं. इस बदले हुए मिजाज और सूखे की इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के पटना स्थित पूर्वी अनुसंधान परिसर ने एक बेहद जरूरी कृषि परामर्श (Advisory) जारी किया है. वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि अगर वक्त रहते खेती के तौर-तरीकों में सही तब्दीली नहीं की गई, तो खरीफ फसलों की पैदावार को भारी नुकसान पहुंच सकता है.
पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले किसानों के लिए यह वक्त अपनी रणनीति बदलने का है. आईसीएआर (ICAR) के वैज्ञानिकों ने मशवरा दिया है कि किसान इस कम बारिश के दौर में लंबी अवधि वाली फसलों के बजाय कम समय में तैयार होने वाली और सूखा सहन करने वाली धान की किस्मों का चयन करें. इनमें मुख्य रूप से 'स्वर्ण श्रेया', 'स्वर्ण उन्नत', 'सहभागी', 'लालट', 'आईआर-64', 'नवीन' और 'बिरसा धान-108' जैसी बेहतरीन किस्में शामिल हैं, जो बेहद कम पानी में भी बढ़िया पैदावार देने की सलाहियत रखती हैं. इसके साथ ही, जिन इलाकों में पानी की भारी किल्लत है या ऊपरी भूमि है, वहां पारंपरिक रोपाई के बजाय धान की सीधी बुआई (Direct Seeded Rice - DSR) को प्राथमिकता दें. अगर पानी की सही सहूलियत उपलब्ध हो, तो सीधी बुआई करते समय बीज की मात्रा में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि जरूर करें.
सिर्फ धान पर निर्भर रहने के बजाय इस सूखे जैसी स्थिति में 'फसल विविधीकरण' (को अपनाना सबसे समझदारी भरा और कामयाब कदम साबित हो सकता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, किसान भाई कम पानी वाले क्षेत्रों में अरहर, मक्का, रागी और मूंगफली जैसी वैकल्पिक फसलों की बुआई कर सकते हैं. अरहर के लिए बहार, बिरसा अरहर-1,UPAS-120, BR-65, नरेंद्र अरहर-1 और IPA-203 जैसी उन्नत किस्मों का चुनाव करें, जिन्हें खेत की मेड़ों पर भी आसानी से उगाया जा सकता है. मक्का उगाने के किसान बिरसा मक्का-1, बिरसा विकास मक्का-1 और 2 का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा, पोषण से भरपूर रागी की बिरसा मड़ुआ-1, 2 और 3 जैसी किस्में बेहतरीन विकल्प हैं. नगदी और दलहनी फसलों के रूप में सोयाबीन, मूंगफली, उड़द, तिल और अन्य मोटे अनाजों को अपनाकर किसान न सिर्फ अपने नुकसान के जोखिम को कम कर सकते हैं, बल्कि अपनी आमदनी को भी पूरी तरह सुरक्षित कर सकते हैं.
संकट के इस दौर में खेतों की सुरक्षा और बेहतर मुनाफे के लिए 'इंटर क्रापिग को एक कारगर तरीका माना गया है. आईसीएआर ने सलाह दी है कि किसान एकल फसल लगाने के बजाय दो फसलों को मिलाकर लगाएं, जिससे मिट्टी की नमी का सही इस्तेमाल हो सके और एक फसल कमजोर होने पर दूसरी सहारा दे सके. इसके लिए कुछ बेहतरीन वैज्ञानिक अनुपात o) तय किए गए हैं, जैसे मक्का और अरहर को 2:1 के अनुपात में, मक्का और लोबिया को 1:1 में, मक्का और उड़द को 1:2 में, तथा अरहर के साथ उड़द या मूंगफली का संयोजन किया जा सकता है. समय और पानी की बचत के लिएमैट-टाइप या डेपोग नर्सरी से धान का बिछड़ा तैयार करना इस वक्त सबसे मुफीद रहेगा. इस तरह झारखंड के किसान न सिर्फ अल नीनो के इस बुरे प्रभाव को मात दे सकते हैं, बल्कि इस सूखे मौसम में खेती से मुनाफा कमा सकते हैं.