126 दिन, 75 जिले, एक लाख से ज्यादा किसान, उत्तर प्रदेश में मिसाल बना Kisan karwan

126 दिन, 75 जिले, एक लाख से ज्यादा किसान, उत्तर प्रदेश में मिसाल बना Kisan karwan

उत्तर प्रदेश सरकार और India Today Group के संयुक्त प्रयास से 126 दिनों तक चला किसान कारवां 75 जिलों में पहुंचा. 1 लाख से अधिक किसानों ने भाग लिया। कारवां में किसानों को आधुनिक खेती, जैविक खेती, पशुपालन, सिंचाई तकनीक, सह-फसली मॉडल और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी गई.

धर्मेंद्र सिंह
  • Noida ,
  • May 19, 2026,
  • Updated May 19, 2026, 11:19 AM IST

उत्तर प्रदेश सरकार और India Today Group के संयुक्त प्रयास से आयोजित “किसान तक का किसान कारवां” प्रदेश के किसानों के लिए जागरूकता, तकनीक और बदलाव का सबसे बड़ा मंच बनकर उभरा. 29 दिसंबर 2025 को अमरोहा जनपद के जलालपुर से शुरू हुआ यह कारवां 126 दिनों की यात्रा पूरी करते हुए 4 मई 2026 को गौतम बुद्ध नगर में संपन्न हुआ.

“75 जनपद, एक यात्रा, किसान के मुद्दे, किसान की बात किसान के साथ” थीम पर आयोजित इस अभियान ने प्रदेश के सभी 75 जिलों में पहुंचकर खेती-किसानी, पशुपालन, बागवानी, जैविक खेती और आधुनिक तकनीक को लेकर किसानों को जागरूक किया। इस दौरान 1 लाख से अधिक किसानों ने कारवां में भागीदारी की.

पश्चिम यूपी में बदला गन्ना मॉडल

कारवां की शुरुआत पश्चिम उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट से हुई. अमरोहा, मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बुलंदशहर, सहारनपुर और हापुड़ जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती देखने को मिली. किसानों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में गन्ना भुगतान व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है.

अमरोहा के किसान चंद्रपाल सिंह ने बताया कि अब गन्ने का भुगतान 15 दिनों के भीतर सीधे बैंक खातों में पहुंच रहा है. पहले किसानों को वर्षों तक भुगतान का इंतजार करना पड़ता था, लेकिन अब व्यवस्था में पारदर्शिता और तेजी आई है.

इसी क्षेत्र में गन्ने की पारंपरिक 0238 प्रजाति की जगह अब 16202 जैसी नई प्रजातियों ने स्थान लेना शुरू कर दिया है. किसानों का कहना है कि नई प्रजातियां रोग प्रतिरोधक होने के साथ बेहतर उत्पादन भी दे रही हैं.

गन्ने के साथ मूंगफली की खेती बना नया मॉडल

मेरठ के सरधना तहसील के कुसावली गांव के प्रगतिशील किसान विनोद सैनी ने गन्ने के साथ मूंगफली की सह-फसली खेती का सफल मॉडल विकसित किया है. उन्होंने बताया कि गन्ने की शुरुआती वृद्धि धीमी होने के कारण खेत खाली रहता था. ऐसे में मूंगफली की खेती से अतिरिक्त आय होने लगी.

इस बार उन्होंने दो एकड़ क्षेत्र में मूंगफली की खेती की है और उत्पादन बेहतर होने की उम्मीद जताई है. किसानों के बीच यह मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है क्योंकि इससे गन्ने की लागत निकल जाती है और अतिरिक्त मुनाफा मिलता है.

MSP और समय पर भुगतान से बढ़ा किसानों का भरोसा

किसान कारवां के दौरान झांसी, जालौन, प्रतापगढ़ और दूसरे जिलों के किसानों ने बताया कि गेहूं, चना और अन्य फसलों की खरीद अब न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर समय से हो रही है.

किसानों का कहना है कि समय पर भुगतान से खेती में निवेश बढ़ा है और आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है. विशेष रूप से गन्ना किसानों ने माना कि भुगतान प्रणाली में सुधार से सरकार के प्रति उनका भरोसा बढ़ा है.

बदल रहा है उत्तर प्रदेश का क्रॉपिंग पैटर्न

किसान कारवां के दौरान प्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर साफ दिखाई दिया. बुंदेलखंड और आगरा क्षेत्र में फरवरी के शुरुआती दिनों में ही गर्मी का असर महसूस होने लगा.

जालौन के किसान अशोक सिंह ने बताया कि पहले क्षेत्र में मेंथा की खेती बड़े पैमाने पर होती थी, लेकिन अब किसान मटर जैसी फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं. वहीं गेहूं की फसल भी पहले की तुलना में जल्दी पकने लगी है.चंबल फर्टिलाइजर के सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार मौसम परिवर्तन के चलते किसान अब फसल बुवाई का समय बदल रहे हैं और नई फसल प्रणालियां अपना रहे हैं.

जैविक खेती की ओर बढ़ रहे किसान

कारवां के दौरान प्रदेश के लगभग हर क्षेत्र में जैविक और प्राकृतिक खेती को लेकर बढ़ती रुचि देखने को मिली. शामली के किसान ठाकुर धर्मपाल सिंह ने बताया कि जैविक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता सुधर रही है और भूजल स्तर में भी सुधार हुआ है. उन्होंने बताया कि पहले खेत में पानी 40 फीट की गहराई पर मिलता था, जबकि अब 25 फीट पर ही पानी उपलब्ध हो जाता है. बुंदेलखंड में पूर्व इंजीनियर बी.के. तिवारी ने प्राकृतिक खेती के माध्यम से बंजर जैसी जमीन पर ड्रैगन फ्रूट, एप्पल बेर, आम और कटहल जैसी बागवानी फसलों का सफल उत्पादन शुरू किया है. पूर्वांचल के किसान सौरव रघुवंशी ने भी जैविक खेती के जरिए अलग पहचान बनाई है.

मिट्टी में घट रहे कार्बनिक तत्व बने चिंता का विषय

किसान कारवां के दौरान सबसे गंभीर मुद्दा मिट्टी के स्वास्थ्य का सामने आया. प्रदेश के अधिकांश जिलों में मृदा में कार्बनिक तत्व की मात्रा बेहद कम पाई गई.

फिरोजाबाद और आगरा जैसे जिलों में कार्बनिक तत्व केवल 0.3 प्रतिशत तक रह गए हैं. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति खेती के भविष्य के लिए खतरे का संकेत है.

जालौन कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद मुस्तफा ने बताया कि कार्बनिक तत्व मिट्टी में सूक्ष्मजीवों का भोजन होते हैं. इनके कम होने से मिट्टी की उत्पादन क्षमता घटने लगती है. कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को गोबर की खाद, हरी खाद और फसल अवशेषों का उपयोग बढ़ाने की सलाह दी.

बुंदेलखंड में दिखी “वन ड्रॉप मोर क्रॉप” की ताकत

कभी पानी की कमी से जूझने वाला बुंदेलखंड अब माइक्रो इरिगेशन मॉडल की मिसाल बन रहा है.किसान स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं.जालौन के किसान अशोक सिंह ने बताया कि स्प्रिंकलर सिंचाई से पानी की खपत एक-तिहाई रह गई है जबकि उत्पादन बढ़ा है.

बांदा कृषि विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर अमित कुमार सिंह के अनुसार अब बुंदेलखंड में खरीफ सीजन में भी प्याज उत्पादन की नई तकनीक किसान सीख रहे हैं.

पशुपालन और डेयरी मॉडल को मिली नई दिशा

किसान कारवां में पशुपालन विभाग की योजनाओं को लेकर किसानों में विशेष उत्साह देखने को मिला. नंदिनी, मिनी नंदिनी और संवर्धन योजना के बारे में किसानों ने बड़ी संख्या में जानकारी हासिल की.पशुपालकों ने सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक, उन्नत नस्ल की गाय और भैंस, डेयरी प्रबंधन और पशु स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भी ली.

पश्चिम उत्तर प्रदेश में अच्छी नस्ल की भैंसों को लेकर रुचि दिखी, जबकि बुंदेलखंड और पूर्वांचल में देसी गाय, बकरी पालन और भेड़ पालन योजनाओं को लेकर किसानों ने सवाल पूछे.

महिलाओं ने कानून व्यवस्था और योजनाओं को सराहा

बुंदेलखंड और पूर्वांचल क्षेत्रों में महिलाओं ने कानून व्यवस्था में सुधार और सरकारी योजनाओं को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी.औरैया की महिला किसान फूलमती ने बताया कि पहले शाम के बाद घर से निकलने में डर लगता था, लेकिन अब महिलाएं खेती, समूह गतिविधियों और व्यवसाय में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.

प्रतापगढ़ की शांति मिश्रा ने बताया कि स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं.

छोटी बोतल का बड़ा कमाल, घटी खेती की लागत

उत्तर प्रदेश में आयोजित किसान कारवां के दौरान ऐसे कई किसान सामने आए, जिन्हें अब तक नैनो यूरिया और लिक्विड डीएपी के उपयोग की सही जानकारी नहीं थी.अधिकांश किसान आज भी पारंपरिक बोरी वाली यूरिया और डीएपी पर ही निर्भर थे.लेकिन जब किसान कारवां के मंच से इफको के प्रतिनिधियों ने नैनो यूरिया और लिक्विड डीएपी के फायदे और उपयोग की जानकारी दी, तो किसान हैरान रह गए कि छोटी सी बोतल खेती में इतना बड़ा बदलाव ला सकती है.

कारवां के दौरान किसानों को बताया गया कि नैनो यूरिया और लिक्विड डीएपी के प्रयोग से खेती की लागत कम होती है और मुनाफा बढ़ता है. साथ ही फसल को नाइट्रोजन और सल्फर जैसे जरूरी पोषक तत्व संतुलित मात्रा में मिलते हैं, जिससे उत्पादन बेहतर होता है. किसानों को इनके सही इस्तेमाल और छिड़काव की विधि भी समझाई गई ताकि फसल को अधिकतम लाभ मिल सके.

विशेष रूप से लिक्विड डीएपी के बीज उपचार से किसानों को अच्छे परिणाम मिले हैं. इससे बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ी और पौधों की शुरुआती वृद्धि मजबूत हुई.किसान कारवां के जरिए फैली इस जागरूकता का असर अब गांवों में भी दिखाई देने लगा है. कई किसानों ने संतुलित उर्वरकों के उपयोग की दिशा में कदम बढ़ाने का फैसला लिया है, जिससे खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सके.

विविधीकरण मॉडल पर सबसे ज्यादा जोर

कृषि वैज्ञानिकों ने किसान कारवां के दौरान किसानों को खेती में विविधीकरण अपनाने की सलाह दी. कानपुर देहात कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. अजय सिंह ने बताया कि किसान अब एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय बहु-फसली मॉडल अपना रहे हैं. इससे जोखिम कम होता है और आय के नए स्रोत बनते हैं. सह-फसली खेती, बागवानी, पशुपालन और जैविक खेती को जोड़कर किसान अब कृषि को व्यवसाय के रूप में देखने लगे हैं.

ब्लॉक स्तर तक कारवां ले जाने की उठी मांग

75 जिलों में मिले भारी समर्थन के बाद किसानों ने मांग की कि किसान कारवां को अब ब्लॉक स्तर तक आयोजित किया जाए ताकि अधिक से अधिक किसानों तक तकनीक और योजनाओं की जानकारी पहुंच सके.

किसानों का कहना है कि इस कारवां ने उन्हें केवल सरकारी योजनाओं की जानकारी ही नहीं दी, बल्कि खेती के नए मॉडल, आधुनिक तकनीक, मिट्टी संरक्षण, पशुपालन और प्राकृतिक खेती की दिशा में सोचने का अवसर भी दिया. 

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