
भारत की खेती में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, और इसे देश के ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. इस बदलाव के पीछे सरकार की PM-KUSUM योजना का बहुत बड़ा योगदान है. इस योजना ने यह साबित कर दिया है कि गांवों और खेतों में भी बड़े स्तर पर सस्ती ऊर्जा पहुंचाई जा सकती है. अब तक इस योजना के तहत 10 लाख से ज्यादा सोलर पंप लगाए जा चुके हैं. खास बात यह है कि पिछले एक साल में इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है. महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने दिखाया है कि अगर सरकार की नीति सही हो और उसे ठीक से लागू किया जाए, तो कम समय में भी बड़े बदलाव संभव है.
महाराष्ट्र में जल्दी-जल्दी हजारों सोलर पंप लगाए गए. लेकिन अब एक नई चुनौती सामने आ रही है. अभी तक यह पूरा सिस्टम ज़्यादातर सरकार के खरीद मॉडल पर चलता है, यानी सरकार ही पंप खरीदकर लगवाती है. लेकिन जैसे-जैसे यह योजना आगे बढ़ रही है, यह साफ हो रहा है कि सिर्फ इसी तरीके से आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है.
'बिजनेस लाइन' की रिपोर्ट के मुताबिक, PM-KUSUM योजना की टेंडर-आधारित व्यवस्था ने शुरुआत में सोलर पंप के बाजार को खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाई. इससे किसानों की मांग को एक जगह इकट्ठा करना आसान हुआ, सरकार ने सब्सिडी देकर इन्हें सस्ता बनाया और कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिलने से उन्होंने अपने उत्पादन को बढ़ाया. लेकिन अब इस मॉडल की कुछ कमियां भी सामने आ रही हैं. सबसे बड़ी समस्या यह है कि मांग लगातार नहीं रहती, बल्कि टेंडर के अनुसार अचानक बढ़ती और फिर घट जाती है.
जब टेंडर जारी होते हैं तो काम बहुत तेज होता है, लेकिन जैसे ही टेंडर खत्म होते हैं, काम भी धीमा पड़ जाता है. इससे कंपनियों के लिए उत्पादन बनाना और कर्मचारियों को स्थिर काम देना मुश्किल हो रहा है. सबसे जरूरी बात ये है कि यह पूरा सिस्टम किसानों की जरूरत के बजाय सरकार के टेंडर और समय-सीमा पर निर्भर हो गया है, जिससे बाजार में स्थिरता की कमी बनी रहती है.
वहीं, अब सबसे बड़ा बदलाव किसानों के व्यवहार में देखने को मिल रहा है, जिन क्षेत्रों में सोलर पंप ज्यादा इस्तेमाल हो रहे हैं, वहां किसान अब इन्हें सिर्फ सब्सिडी के कारण नहीं अपना रहे, बल्कि अपने और दूसरे किसानों के अनुभव के आधार पर फैसला ले रहे हैं. उन्हें समझ आ गया है कि डीजल के मुकाबले सोलर पंप ज्यादा भरोसेमंद हैं, खर्च का पहले से अंदाजा रहता है और सिंचाई पर उनका खुद का नियंत्रण रहता है. लेकिन यहीं पर मौजूदा सिस्टम की कमी सामने आती है. अभी सोलर पंप लेने का मौका ज़्यादातर टेंडर पर निर्भर करता है. यानी अगर उस समय टेंडर नहीं निकला, तो किसान चाहकर भी पंप नहीं लगवा पाता.
कई मामलों में समस्या ये नहीं है कि किसान सोलर पंप लेना नहीं चाहते, बल्कि दिक्कत ये है कि वे इसे आसानी से ले नहीं पाते. सब्सिडी मिलने के बाद भी शुरुआत में किसानों को कुछ पैसे खुद देने पड़ते हैं, जो खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए बड़ी बाधा बन जाते हैं. इसके अलावा हर राज्य में आसान और सही फाइनेंस भी एक जैसी उपलब्ध नहीं है.
अब एक और अहम बात साफ़ दिखने लगी है कि अलग-अलग राज्यों में इस योजना को लागू करने का तरीका एक जैसा नहीं है. कुछ राज्यों ने सोलर पंप लगाने के लिए मजबूत सिस्टम और अच्छी व्यवस्था बना ली है, जिससे काम तेजी और आसानी से हो रहा है. वहीं कई राज्यों में अभी भी दिक्कतें हैं, जैसे मंजूरी मिलने में देरी, कागजी प्रक्रियाओं में देरी. यह स्थिति एक जरूरी बात बताती है कि भले ही योजना पूरे देश के लिए एक जैसी हो, लेकिन उसका असर हर जगह अलग-अलग होता है. असली फर्क इस बात से पड़ता है कि जमीन पर इसे कितनी अच्छी तरह लागू किया जा रहा है.