
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने देश के 11 प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में पर्यावरण की हिफाजत, प्राकृतिक संसाधनों का सही इस्तेमाल और स्थानीय समुदायों की रोजी-रोटी को मजबूत बनाने के मकसद से एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (ABS) व्यवस्था के तहत 6.67 करोड़ रुपये की कुल राशि जारी कर दी है. यह पूरी पहल इस बात का एक बेहतरीन नमूना है कि जब कोई भी व्यापारिक घराना या कंपनी देश के कीमती जैविक संसाधनों का व्यावसायिक इस्तेमाल करके मुनाफा कमाती है, तो उस लाभ का एक हिस्सा सीधे तौर पर जैव विविधता के संरक्षण, जंगलों की सुरक्षा और स्थानीय किसानों के कल्याण में पुनर्निवेशित किया जाना चाहिए.
भारत के आर्थिक और कृषि परिदृश्य में कपास का एक बेहद अहम और अनूठा स्थान है, और यह फसल पूरी मूल्य श्रृंखला में लगभग 4 से 5 करोड़ लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है. चूंकि यह आनुवंशिक संसाधन अक्सर बिचौलियों के माध्यम से प्राप्त किए गए थे, इसलिए व्यक्तिगत लाभार्थियों की पहचान करना नामुमकिन था. इस समस्या को सुलझाने के लिए NBA ने एक पारदर्शी तरीका अपनाया ताकि संसाधनों से मिला लाभ सीधे उन क्षेत्रों तक पहुंच सके जहाँ कपास उगाई जाती है.
यह पूरी रकम रिसर्च और व्यापार से जुड़े लाभ-साझेदारी से प्राप्त हुई है. मेसर्स बायर साइंस एंड इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड ने कपास ( की 25,431 किस्मों पर रिसर्च के लिए 7.62 करोड़ रुपये की राशि जमा की थी. भारत में कपास केवल एक फसल नहीं है, बल्कि यह देश के लगभग 4 से 5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी का जरिया है. चूंकि यह प्राकृतिक संसाधन बिचौलियों और व्यापारियों के जरिए खरीदे गए थे, इसलिए किसी एक खास किसान या व्यक्ति की पहचान करना मुमकिन नहीं था.
ऐसी स्थिति से निपटने के लिए NBA ने एक पारदर्शी तरीका तैयार किया. जब यह साफ हो जाता है कि कोई संसाधन किस क्षेत्र से आया है, तो उस राशि को संबंधित राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) को सौंप दिया जाता है. इस नीति के तहत 11 राज्यों को उनके कपास खेती के क्षेत्रफल के आधार पर धनराशि बांटी गई है. इसमें सबसे ज्यादा राशि महाराष्ट्र 2.41 करोड़ गुजरात 1.38 करोड़ और तेलंगाना 1.06 करोड़ रूपये मिली है. बाकी राशि कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, पंजाब और तमिलनाडु में बांटी गई, जबकि ₹0.95 करोड़ रुपये नियमों के मुताबिक NBA के पास सुरक्षित रखे गए हैं.
इस फंड का इस्तेमाल जमीनी स्तर पर पर्यावरण और खेती को बेहतर बनाने के लिए होगा. इससे जंगलों और खेतों में पौधों की सुरक्षा, 'पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर' का दस्तावेजीकरण, पारंपरिक ज्ञान को संभालना, जैव विविधता अनुसंधान (Research) और स्थानीय समितियों को प्रशिक्षण देने जैसे काम किए जाएंगे. यह कदम न केवल हमारी फसलों की आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) को बचाएगा, बल्कि स्थानीय समुदायों को अपनी प्राकृतिक संपत्ति का असली रखवाला बनने में भी मदद करेगा.
इस नए आवंटन के साथ ही NBA द्वारा अब तक जारी की गई कुल ABS राशि 152.24 करोड़ रुपये हो गई है. यह पहल साबित करती है कि अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और सामाजिक न्याय का एक साथ विकास संभव है. यह भारत के नागोया प्रोटोकॉल और अंतरराष्ट्रीय कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के प्रति प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) पर्यावरण मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक वैधानिक संस्था है, जो भारत के प्राकृतिक संसाधनों के सही और बराबरी के बंटवारे को सुनिश्चित करती है.