
छत्तीसगढ़ में कृषि क्षेत्र को मजबूत, आधुनिक और किसान-केंद्रित बनाने की दिशा में राज्य सरकार की योजनाओं का असर अब व्यापक स्तर पर दिखाई दे रहा है. कृषक उन्नति योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, कृषि यंत्रीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, प्राकृतिक खेती, उद्यानिकी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी पहलों के जरिए किसानों की आय बढ़ाने के साथ खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है.
कृषक उन्नति योजना के माध्यम से खरीफ 2023 से खरीफ 2025 तक करीब 25.52 लाख किसानों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के जरिए 35,892.90 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई.वहीं प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत 24.63 लाख किसानों को 23वीं किस्त के रूप में 493 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई. सरकार ने किसानों तक योजनाओं का लाभ तेजी और पारदर्शिता से पहुंचाने के लिए एग्रीस्टैक, ई-केवाईसी और अन्य डिजिटल सेवाओं का भी विस्तार किया है.
कृषि को पारंपरिक व्यवस्था से निकालकर आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए कृषि यंत्रीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है.अब तक 7,745 किसानों को आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराए गए हैं, जबकि किसानों को सामूहिक रूप से मशीनरी उपलब्ध कराने के लिए 568 फार्म मशीनरी बैंक स्थापित किए गए हैं.
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत करीब 41,967 हेक्टेयर क्षेत्र में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार किया गया है.इससे पानी की बचत के साथ फसलों की उत्पादकता और सिंचाई दक्षता बढ़ाने में मदद मिल रही है.इसके साथ ही प्राकृतिक खेती को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है.प्रदेश में 57 हजार से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा गया है, जिससे कम लागत वाली खेती, मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है.
छत्तीसगढ़ में किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ उद्यानिकी और अन्य लाभकारी फसलों की ओर प्रोत्साहित किया जा रहा है. प्रदेश में उद्यानिकी फसलों का क्षेत्रफल बढ़कर 8.91 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है.
ऑयल पाम और बांस रोपण को बढ़ावा देने के साथ ही हाईटेक नर्सरी, पैक हाउस और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है. इन अधोसंरचनाओं के विकसित होने से किसानों को उत्पादन के बाद भंडारण, प्रसंस्करण और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी.
कृषि के साथ पशुपालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनाने पर भी जोर दिया गया है.प्रदेश में दुग्ध उत्पादन, डेयरी भुगतान व्यवस्था और मोबाइल पशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार किया गया है.
मत्स्य पालन क्षेत्र में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. राज्य का मत्स्य उत्पादन करीब 23 प्रतिशत बढ़कर 9.59 लाख टन तक पहुंच गया है. इस प्रगति के साथ छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी मत्स्य उत्पादक राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है.
कृषि विपणन व्यवस्था को डिजिटल और पारदर्शी बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं.प्रदेश की 21 मंडियां राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) से जुड़ चुकी हैं.इससे किसानों को कृषि उपज के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध कराने और व्यापार प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने में मदद मिल रही है.
कृषि अवसंरचना निधि के तहत राज्य के लिए निर्धारित 1,900 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 3,026 करोड़ रुपये की उपलब्धि हासिल की गई है.वहीं बीज उत्पादन और प्रमाणीकरण की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन किया गया है.रायपुर की शासकीय बीज परीक्षण प्रयोगशाला को NABL मान्यता मिलना प्रदेश में बीज गुणवत्ता परीक्षण और वैज्ञानिक कृषि व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है.
एग्रीस्टैक, ई-केवाईसी और डिजिटल सेवाओं के विस्तार से किसान योजनाओं का लाभ अधिक आसानी और पारदर्शिता के साथ प्राप्त कर रहे हैं.DBT के माध्यम से सीधे किसानों के खातों में सहायता राशि पहुंचने से बिचौलियों की भूमिका कम करने और योजनाओं की निगरानी को मजबूत करने में मदद मिली है.
राज्य सरकार का जोर अब केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती से जुड़े पूरे इकोसिस्टम—इनपुट, उत्पादन, सिंचाई, मशीनरी, भंडारण, विपणन और प्रसंस्करण—को मजबूत करने पर है.
स्वतंत्रता के 79 वर्षों की इस ऐतिहासिक बेला में छत्तीसगढ़ का कृषि क्षेत्र तेजी से बदलाव की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है. किसान-केंद्रित योजनाओं, आधुनिक कृषि तकनीक, डिजिटल सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण कृषि इनपुट, सिंचाई सुविधाओं और कृषि अधोसंरचना के विस्तार ने प्रदेश की खेती को नई दिशा दी है.
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व, कृषि मंत्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन और कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी के प्रशासनिक नेतृत्व में राज्य सरकार कृषि क्षेत्र को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दे रही है.
कृषक उन्नति योजना से लेकर प्राकृतिक खेती, कृषि यंत्रीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, उद्यानिकी, पशुपालन और मत्स्य पालन तक की पहलों से यह संकेत मिल रहा है कि छत्तीसगढ़ में खेती-किसानी को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ के रूप में विकसित करने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है.