महाराष्ट्र के जालना जिले के भोकरदन तहसील का लोणगांव ‘शकरकंद का गांव’ के नाम से प्रसिद्ध है. यहां के किसान बड़े पैमाने पर शकरकंद की खेती करते हैं. वहीं, महाशिवरात्रि के अवसर पर शकरकंद की मांग बढ़ने से गांव में बड़ी आर्थिक हलचल देखने को मिलती है.
गांव के लगभग 50 प्रतिशत किसान शकरकंद की खेती से जुड़े हुए हैं. हर वर्ष जून महीने में शकरकंद की बुवाई की जाती है और फसल तैयार होने में लगभग 8 से 9 महीने का समय लगता है. महाशिवरात्रि तक शकरकंद खुदाई के लिए तैयार हो जाती है.
उपवास के कारण इस समय बाजार में इसकी मांग काफी बढ़ जाती है. वहीं, पिछले 22 से 25 वर्षों से यहां के किसान शकरकंद की खेती कर रहे हैं. लोणगांव में करीब 200 से 250 एकड़ क्षेत्र में शकरकंद की खेती होती है. हल्की और भुरभुरी जमीन में कम लागत में यह फसल ली जाती है. एक एकड़ से औसतन 100 से 120 क्विंटल उत्पादन मिलता है.
हालांकि, इस वर्ष भारी बारिश के कारण उत्पादन में कमी आई है. एक एकड़ में शकरकंद की खेती के लिए करीब 50 से 60 हजार रुपये खर्च आता है. वर्तमान में बाजार में 1200 से 1300 रुपये प्रति क्विंटल यानी 12 से 13 रुपये प्रति किलो का भाव मिल रहा है.
किसानों की मांग है कि कम से कम 20 रुपये प्रति किलो यानी 2000 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलना चाहिए. लोणगांव के किसान रामेश्वर सावंत ने चार एकड़ में शकरकंद की खेती की, जिसमें करीब 400 क्विंटल उत्पादन हुआ. लेकिन उचित भाव न मिलने से उन्होंने नाराजगी जताई और सरकार से उचित मूल्य दिलाने की मांग की हैं.
वहीं, किसान सतीश खरात ने दो एकड़ में खेती कर 13 रुपये प्रति किलो के भाव से शकरकंद बेची. उनका कहना है कि महाशिवरात्रि के दौरान मांग अधिक रहती है, इसलिए गांव के अधिकतर किसान इस फसल की ओर रुख करते हैं. किसान शाम सावंत ने बताया कि इस वर्ष अतिवृष्टि के कारण उत्पादन घटकर 70 से 80 क्विंटल प्रति एकड़ रह गया है.
पिछले वर्षों में जहां 1500 से 1600 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलता था, वहीं इस बार केवल 1100 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल ही मिल पाया. शकरकंद की फसल में खुदाई के समय मजदूरी का खर्च अधिक होता है.
इसके अलावा सफेद मक्खी, सुरोंड कीट और पत्तों पर लगने वाले रोगों से बचाव के लिए कीटनाशक और फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है. खाद और अन्य खर्च भी काफी बढ़ गए हैं. उत्पादन और आय में गिरावट से किसान चिंतित हैं और सरकार से शकरकंद को उचित समर्थन मूल्य देने की मांग कर रहे हैं. (गौरव विजय साली की रिपोर्ट)