PHOTOS: गरीबी से समृद्धि तक, इस फॉर्मूले ने गांव के हर किसान को बनाया लखपति

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PHOTOS: गरीबी से समृद्धि तक, इस फॉर्मूले ने गांव के हर किसान को बनाया लखपति

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महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले में जहां अक्सर किसान कपास, और बाजरा जैसी पारंपरिक फसलों में लागत न निकलने और पानी की कमी से परेशान रहते हैं. वहीं, देवगांव के 45 वर्षीय किसान सदाशिव गोपीनाथ गीते ने अपनी सोच बदलकर खेती की तस्वीर बदल दी है.

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पहले जहां वे साल भर हाड़-तोड़ मेहनत करके मात्र 93,000 रुपये ही कमा पाते थे, वहीं रेशम कीट पालन यानी सेरीकल्चर की आधुनिक तकनीक और हाइब्रिड बीज उत्पादन को अपनाकर आज वे सालाना 13 लाख रुपये से ज्यादा का मुनाफा ले रहे हैं. उन्होंने पारंपरिक खेती के घाटे के चक्र को तोड़ते हुए अपनी कमाई में 12 गुना से अधिक की बढ़ोतरी की है.

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सदाशिव ने न केवल खुद को आर्थिक रूप से मजबूत किया, बल्कि अपने गांव के 90 प्रतिशत किसानों को भी बदलाव का रास्ता दिखाया, जिससे आज उनका पूरा इलाका रेशम उत्पादन का एक बड़ा हब बन गया है और हर घर में बंपर कमाई हो रही है. 

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साल 2018-19 तक सदाशिव पूरी तरह से कपास, तुअर (अरहर) और बाजरा जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे. कड़ी मेहनत के बावजूद, इन फसलों से मिलने वाली आय बहुत कम थी और सालभर में वे बमुश्किल 93,000 रुपये का मुनाफा कमा पाते थे. खेती की बढ़ती लागत और अनिश्चित मॉनसून के कारण जीवन यापन मुश्किल होता जा रहा था.

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इसी दौरान उन्होंने रेशम कीट पालन के क्षेत्र में उतरने का फैसला किया और 3 एकड़ भूमि में शहतूत की खेती शुरू की. यह फैसला उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ, जिसने उन्हें एक साधारण किसान से एक सफल एग्री एंटरप्रेन्योर बना दिया.

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सदाशिव ने अपने काम को और अधिक पेशेवर बनाने के लिए एक कंपनी के साथ हाथ मिलाया. उन्होंने केवल रेशम के कोकून उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय 'हाइब्रिड सिल्कवर्म सीड प्रोडक्शन' FC1 और FC2 किस्म के बीज पर ध्यान केंद्रित किया. इस नवाचार की सबसे बड़ी खूबी 'बाय-बैक एग्रीमेंट' है.

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आज वे साल भर में हाइब्रिड बीजों के 10 बैच तैयार करते हैं, जिससे उनके खेत में साल के 12 महीने काम और कमाई बनी रहती है. सदाशिव की सफलता के पीछे उनकी तकनीकी सूझबूझ का बड़ा हाथ है. उन्होंने कोकून की उम्र और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कई वैज्ञानिक तरीके अपनाए. उन्होंने मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए प्रति हेक्टेयर 1 से 2 टन गोबर की खाद  का नियमित प्रयोग किया. 

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रेशम कीट पालन में तापमान का बहुत महत्व होता है, जिसे सदाशिव ने बखूबी समझा. उन्होंने कीटों के लिए अनुकूल 18 से 24 डिग्री सेल्सियस का तापमान बनाए रखने की तकनीक विकसित की, जिससे रेशम के धागे की गुणवत्ता बेहतर हुई और कोकून ज्यादा समय तक सुरक्षित रहने लगे.

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सदाशिव गोपीनाथ गीते का यह मॉडल पूरे महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में भी लागू किया जा सकता है. खास तौर पर उन क्षेत्रों में जहां शहतूत की खेती की संभावना है, छोटे और सीमांत किसान इस तकनीक को अपनाकर अपनी गरीबी दूर कर सकते हैं. हालांकि, इस नवाचार को और अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए बीज की गुणवत्ता, हाइब्रिड ताकत और अलग-अलग मौसम में इनकी अनुकूलता का वैज्ञानिक सत्यापन जरूरी है. 

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