
महाराष्ट्र के जालना जिले में बंजर हो चुकी पहाड़ियों को फिर से हरा-भरा बनाने की दिशा में एक अनोखी और आधुनिक पहल शुरू की गई है. पहली बार ड्रोन तकनीक के जरिए पहाड़ियों पर देसी पौधों के बीजों की बुवाई की जा रही है. जालना फर्स्ट सामाजिक संस्था की ओर से शुरू किए गए इस अभियान में तीन दिनों के दौरान करीब 25 हेक्टेयर क्षेत्र में 265 किलो देसी पौधों के बीजों का ड्रोन से छिड़काव किया जाएगा.
इस अभियान का उद्देश्य आने वाले वर्षों में इन पहाड़ियों को फिर से घने जंगल में बदलना है. जालना के बदनापूर तहसील के खादगांव शिवार में एमआईडीसी फेज-3 के पास स्थित पहाड़ियों पर जिले के पहले ड्रोन सीडिंग-2026 अभियान की शुरुआत की गई. इस अभियान में पुणे से मंगाए गए करीब 265 किलो देसी पौधों के बीज इस्तेमाल किए जा रहे हैं. पहले दिन ड्रोन के माध्यम से लगभग 25 हेक्टेयर क्षेत्र में 250 किलो बीजों का छिड़काव किया गया.
यह अभियान लगातार तीन दिनों तक चलेगा. ड्रोन तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जिन दुर्गम और खड़ी पहाड़ियों तक इंसान पहुंचकर पौधरोपण नहीं कर सकता, वहां भी आसानी से बीज पहुंचाए जा सकते हैं. ड्रोन पहाड़ियों के ऊपर उड़ान भरते हुए निर्धारित स्थानों पर बीज गिराता है, जिससे कम समय में बड़े क्षेत्र को कवर किया जा सकता है. यह तकनीक श्रम, समय और लागत-तीनों की बचत करती है.
अभियान के तहत पारसी टेकड़ी से लेकर मुंबई-नागपुर समृद्धि महामार्ग के पार स्थित पहाड़ियों तक बीजों का छिड़काव किया जाएगा. इसमें मुख्य रूप से बरगद, पीपल, नीम, इमली, सीताफल, अमरूद, करंज, अमलतास, खैर, अर्जुन और पलाश जैसी स्थानीय और कम पानी में पनपने वाली भारतीय प्रजातियों के बीज शामिल हैं. इन प्रजातियों का चयन स्थानीय जलवायु और मिट्टी को ध्यान में रखकर किया गया है.
जिले में पिछले तीन सप्ताह के दौरान हुई अच्छी बारिश से पहाड़ियों की मिट्टी में पर्याप्त नमी है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मौसम में बीजों के अंकुरित होने की संभावना अधिक रहती है और पौधों की वृद्धि भी तेजी से होती है. हालांकि ड्रोन सीडिंग में सभी बीजों का अंकुरित होना संभव नहीं होता, इसलिए अगले चार वर्षों तक इसी तकनीक से लगातार बीजों की बुवाई करने की योजना बनाई गई है.
जालना फर्स्ट संस्था पिछले पांच वर्षों से पारसी टेकड़ी पर वृक्षारोपण और उसके संरक्षण का कार्य कर रही है. विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवकों और नागरिकों के सहयोग से यहां हजारों पौधे लगाए गए हैं. जल संरक्षण के लिए किए गए कार्यों के कारण अब यह इलाका हरियाली से आच्छादित हो चुका है.
संस्था का लक्ष्य इसी मॉडल को आसपास की अन्य बंजर पहाड़ियों तक पहुंचाकर हरित क्षेत्र का विस्तार करना है. ड्रोन सीडिंग जैसी आधुनिक तकनीक और सामुदायिक सहभागिता के जरिए जालना में पर्यावरण संरक्षण की नई शुरुआत हुई है. यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में जिले की बंजर पहाड़ियां फिर से हरे-भरे जंगलों में बदल सकती हैं और पर्यावरण संतुलन के साथ-साथ जैव विविधता को भी नया जीवन मिल सकता है. (गौरव विजय साली की रिपोर्ट)