
रबी सीजन के गेहूं की फसल की कटाई देश भर में इन दिनों जोरों पर जारी है. इस बीच हर साल सर्दियों के मौसम खेतों से उठता धुआं इस बार गर्मियों में भी देखने को मिल रहा है. दरअसल, गेहूं की पराली जलाने की घटनाओं में इस बार 23 फीसदी की तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसने पर्यावरण विशेषज्ञों और प्रशासन दोनों की नींद उड़ा दी है. आंकड़ों के मुताबिक, इस संकट में सबसे बड़ी हिस्सेदारी मध्य प्रदेश की 69 फीसदी रही, जबकि उत्तर प्रदेश 30 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है. बढ़ते प्रदूषण के बीच यह मुद्दा अब सिर्फ कृषि नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा का गंभीर सवाल बनता जा रहा है.
हालांकि, गेहूं कटने के बाद बची हुई पराली जलाने की घटनाओं पर सैटेलाइट से नजर रखी जा रही है. सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा के आधार पर यह पता लगाया जाता है कि कहां-कहां आग लगाई गई है. इस बीच 22 अप्रैल को एक ही दिन में 3,463 जगह पर पराली जलाने की घटनाएं सामने आई हैं. वहीं, 1 अप्रैल से अब तक कुल 32,630 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं. पिछले साल इसी समय तक ये संख्या 26,574 थी. यानी इस साल पराली जलाने की घटनाएं लगभग 23 फीसदी तक बढ़ गई हैं.
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के तहत काम करने वाले सीआरईएएमएस नाम के संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 22 अप्रैल के बीच गेहूं की पराली जलाने की सबसे ज्यादा घटनाएं मध्य प्रदेश में हुईं. इस दौरान मध्य प्रदेश में 22,475 घटनाएं दर्ज की गईं. इसके बाद उत्तर प्रदेश में 9,952 घटनाएं, हरियाणा में 108, पंजाब में 88 और दिल्ली में 7 घटनाएं सामने आई हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राजस्थान में पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी नहीं की जाती है.
पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में उत्तर प्रदेश में घटनाओं की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है, जबकि मध्य प्रदेश में 4 प्रतिशत और हरियाणा में 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पंजाब में 1 से 22 अप्रैल, 2025 के दौरान पराली जलाने की 88 घटनाएं दर्ज की गई है, जो कि इस साल के बराबर हैं.
आधिकारिक आंकड़ों से यह भी पता चला है कि मध्य प्रदेश में पराली जलाने की सबसे अधिक घटनाएं विदिशा (2,491), रायसेन (2,179), उज्जैन (2,096), होशंगाबाद (1,705) और सिवनी (1,639) जिलों से दर्ज की गई है. इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में भी पराली जलाने के मामलों में सबसे अधिक योगदान देने वाले जिले पूर्वी क्षेत्र में हैं. इनमें सिद्धार्थनगर (3,042), गोरखपुर (1,277), देवरिया (952), महाराजगंज (928) और संत कबीर नगर (847) शामिल हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि इन राज्यों को स्थानीय प्रतिनिधियों को साथ लेकर किसानों को समझाने और जागरूक करने के लिए और ज्यादा प्रयास करने होंगे. उन्होंने यह भी कहा कि यह चिंता की बात है कि जिम्मेदारी कोई भी लेना नहीं चाहता, जबकि इन दोनों राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं.