
भारत में बाहर से कपास मंगाने की मजबूरी लगातार बढ़ती जा रही है, जो अब एक बहुत बड़ी चिंता की बात है.देश के जाने-माने कृषि वैज्ञानिक और और पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. आर.एस. परोदा ने इन हालात पर गहरी चिंता जताई है और सरकार से तुरंत जरूरी कदम उठाने की अपील की है। उनका साफ कहना है कि अगर भारत को कपास के मामले में दुनिया भर में अपना पुराना रुतबा वापस पाना है, तो हमें जल्द से जल्द नई 'जीएम टेक्नोलॉजी' और विज्ञान पर आधारित नीतियां अपनानी होंगी.उन्होंने आज के हालात को भारतीय किसानों और हमारी खेती-किसानी के लिए एक बड़ा झटका बताया है.
उनका कहना है कि आज दुनिया भर में कपास उगाने वाले देश खेती की नई तकनीकों का तेजी से फायदा उठा रहे हैं, लेकिन हमारे भारतीय किसानों को पिछले 20 सालों से इस तकनीक से दूर रखा गया है। नई तकनीक न मिल पाने की वजह से हमारी पैदावार, ग्लोबल मार्केट में दुनिया से टक्कर लेने की क्षमता और किसानों की कमाई पर बहुत बुरा असर पड़ा है.
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के हालिया डराने वाले आंकड़ों को देखकर, आईसीएआर (ICAR) के पूर्व महानिदेशक डॉ. आर.एस. परोदा ने सरकार से एक बड़ी अपील की है. उन्होंने कहा है कि सरकार को कपास उद्योग की हालत को बहुत बारीकी से समझना चाहिए। एक ऐसी लंबी योजना बनाने की जरूरत है, जो नई तकनीक और विज्ञान पर टिकी हो. उनका साफ मानना है कि बिना पारदर्शी और वैज्ञानिक सिस्टम के हम इस बड़े नुकसान से नहीं उबर पाएंगे.सीएआई के नए आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 के सीजन में भारत को बाहर से 60 लाख गांठ (बेल्स) कपास मंगानी पड़ सकती है, जबकि हमारा निर्यात गिरकर सिर्फ 15 लाख गांठ तक रह सकता है.
दूसरी तरफ, देश के अंदर कपास की खपत बढ़कर 348 लाख गांठ हो गई है. मांग और पैदावार के बीच का यह बड़ा फासला खतरे का बहुत बड़ा इशारा है.डॉ. परोदा ने कहा, "ये आंकड़े हमें नींद से जगाने के लिए काफी हैं.जो भारत 2014 तक दुनिया में सबसे ज्यादा कपास उगाता था और निर्यात में दूसरे नंबर पर था, वो आज अपनी पहचान खो रहा है." उन्होंने याद दिलाया कि एक तरफ प्रधानमंत्री जी देश को 'आत्मनिर्भर' बनाने की बात करते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ कपास के लिए विदेशों पर निर्भर रहना हमें बेवजह के बाजारू और बाहरी खतरों में धकेल रहा है.
डॉ. परोदा ने बताया कि कपास की खेती में आ रही ये परेशानियां सिर्फ आज के खराब मौसम का नतीजा नहीं हैं, बल्कि ये कमियां जड़ से जुड़ी हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह नई सोच और तकनीक को बढ़ावा देने वाली नीतियों का न होना है; जबकि इसी नई सोच की बदौलत पिछले 25 सालों में भारत ने कपास उत्पादन में बड़ी कामयाबी हासिल की थी.
आज कपास की खेती करीब 70 लाख किसानों की रोजी-रोटी चलाती है और कई बड़े उद्योगों को कच्चा माल देती है.डॉ. परोदा ने चेताते हुए कहा, "हमें बाहर से कपास मंगाना कम करके फिर से आत्मनिर्भर बनना ही होगा. हमारे वैज्ञानिकों में इसकी पूरी काबिलियत है. लेकिन अफ़सोस की बात है कि सरकार के नए 'कपास मिशन' में 'जीएम कॉटन'जैसी जांची-परखी तकनीक को अपनाने पर चुप्पी साधी गई है. जबकि यह तकनीक किसानों और देश की खेती दोनों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है."
डॉ. परोदा ने सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि भारत को दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए, ताकि खेती में नई वैज्ञानिक खोजों को बिना किसी देरी के अपनाया जा सके. दुनिया के जिन भी देशों ने आज अपनी पहचान बनाई है, उन्होंने हमेशा नई तकनीकों को खुले दिल से अपनाया है और भविष्य को देखकर नीतियां बनाई हैं.
भारत को भी अपने सरकारी सिस्टम को साफ-सुथरा और विज्ञान पर आधारित बनाना होगा, ताकि किसानों को नई तकनीक का सुरक्षित और पूरा फायदा मिल सके. हमें आज उसी जज्बे और सोच की जरूरत है, जैसी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के समय में देखने को मिली थी, जब उन्होंने 'बीटी कॉटन' को मंजूरी दी थी. अगर हमें अपना खोया हुआ मुकाम वापस पाना है, तो पुरानी सोच को छोड़कर विज्ञान और नई तकनीक का हाथ थामना ही होगा.