
तमिलनाडु के मदुरै जिले के मेलूर तालुक में आम उत्पादक किसानों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है. 'किली मूकू' (तोतापुरी) किस्म के आम का खेत स्तर पर मिलने वाला दाम घटकर महज 3 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है. हालात ऐसे हैं कि कई किसानों ने आम की तुड़ाई बंद कर दी है और फसल को पेड़ों पर ही सड़ने के लिए छोड़ दिया है. वहीं, कुछ किसान लगातार हो रहे नुकसान से बचने के लिए अपने आम के बाग तक काटने को मजबूर हो गए हैं. दाम में गिरावट का असर मेलूर क्षेत्र की एक हजार एकड़ से अधिक आम की खेती पर पड़ा है.
किसानों का कहना है कि उत्पादन लागत, बागों के रखरखाव और मजदूरी का खर्च अब आम की बिक्री से मिलने वाली आय से कहीं ज्यादा हो गया है. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि किसानों को खेत पर सिर्फ 3 रुपये प्रति किलोग्राम का भाव मिल रहा है, जबकि यही आम खुदरा बाजार में 40 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक कीमत पर बिक रहा है.
स्थानीय किसान जीवा ने बताया कि इस क्षेत्र में एक एकड़ आम के बाग के रखरखाव और उत्पादन पर हर साल लगभग 1 लाख रुपये खर्च होते हैं. इसके बावजूद किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है और न ही उन्हें लागत के अनुरूप आय हासिल हो रही है. उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों में आम के दाम लगातार गिरते गए हैं. पहले किसानों को करीब 5 रुपये प्रति किलोग्राम का भाव मिलता था, फिर यह 4 रुपये पर आया और अब केवल 3 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है.
जीवा ने कहा कि दूसरी ओर आम से बनने वाले जूस और अन्य पेय पदार्थ बाजार में कहीं अधिक कीमत पर बिक रहे हैं. उदाहरण के तौर पर आम के जूस की एक छोटी बोतल करीब 10 रुपये में बिकती है, जबकि उसी जूस का आधार बनने वाले कच्चे आम के लिए किसानों को सिर्फ 3 रुपये प्रति किलोग्राम का मूल्य मिल रहा है. किसानों का कहना है कि मूल्य श्रृंखला में सबसे ज्यादा नुकसान उत्पादकों को उठाना पड़ रहा है.
किसान जीवा ने बताया कि मौजूदा कीमत पर आम की तुड़ाई कराना भी संभव नहीं रह गया है. 3 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर मजदूरी, परिवहन, कमीशन और अन्य संचालन खर्च निकालना असंभव हो गया है. उन्होंने बताया कि एक मजदूर को 700 रुपये प्रतिदिन से कम पर काम पर नहीं रखा जा सकता, जबकि कई बार पूरी तुड़ाई से मिलने वाली रकम भी इतनी नहीं होती कि मजदूरी का खर्च निकल सके. इसी वजह से मजदूर भी तुड़ाई के काम में रुचि नहीं दिखा रहे हैं.
लगातार नुकसान और बढ़ते कर्ज के चलते कोट्टामपट्टी यूनियन के कई किसानों ने अपने आम के पेड़ काटने शुरू कर दिए हैं. किसानों का कहना है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली तो आने वाले समय में आम की खेती छोड़ने वालों की संख्या और बढ़ सकती है.
किसान संगठनों ने तमिलनाडु सरकार से आम के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग की है. किसानों ने कहा कि सरकार को बाजार की वास्तविक स्थिति और उत्पादन लागत को ध्यान में रखते हुए किसानों के लिए उचित समर्थन मूल्य घोषित करना चाहिए. उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने इस दिशा में पहले ही कदम उठाए हैं. पिछले साल कुछ क्षेत्रों में किसानों को लगभग 8 रुपये प्रति किलोग्राम का समर्थन मूल्य भी दिया गया था.
जीवा ने कहा कि तमिलनाडु में भी आम की खेती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखने के लिए कम से कम 20 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसान और किसान संगठन पिछले दो वर्षों से लगातार यह मांग उठा रहे हैं, लेकिन अब तक इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है.
किसानों ने राज्य सरकार से फल पल्प उद्योगों और जूस बनाने वाली कंपनियों के साथ समन्वय स्थापित कर किसानों से उचित मूल्य पर खरीद सुनिश्चित कराने की भी मांग की है. उनका कहना है कि मौजूदा संकट केवल मदुरै तक सीमित नहीं है. कृष्णागिरि, सलेम, धर्मपुरी और डिंडीगुल जैसे प्रमुख आम उत्पादक जिलों में भी किसान इसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं. अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो राज्य के हजारों आम उत्पादकों की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है. (एएनआई)