पहले एक्सपोर्ट बैन की मार फ‍िर स्टॉक का प्रहार...पॉल‍िसी के पंगे में फंसा क‍िसान

पहले एक्सपोर्ट बैन की मार फ‍िर स्टॉक का प्रहार...पॉल‍िसी के पंगे में फंसा क‍िसान

देश में गेहूं और चावल का भंडार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है, लेकिन इसके बावजूद किसानों को उनकी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पा रहा है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार FCI के गोदामों में अनाज जरूरत से लगभग तीन गुना ज्यादा है, वहीं गेहूं, धान, मक्का, दालें और तिलहन MSP से नीचे बिक रहे हैं. रबी फसलों की कटाई लगभग पूरी हो चुकी है, मगर खरीद की धीमी रफ्तार ने किसानों को खुले बाजार में औने‑पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर कर दिया है. बढ़ती लागत और गिरती कीमतों के बीच किसान भारी आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं, जबकि MSP का वादा जमीनी स्तर पर खोखला साबित हो रहा है.

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रवि कांत सिंह
  • New Delhi,
  • May 07, 2026,
  • Updated May 07, 2026, 7:18 PM IST

देश में अनाज का भंडार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है, लेकिन खेतों में खून‑पसीना बहाने वाले किसान आज सबसे ज्यादा नुकसान झेल रहे हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1 अप्रैल तक भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में गेहूं और चावल का कुल स्टॉक 604.02 लाख टन हो गया है, जो अनिवार्य बफर जरूरत से लगभग तीन गुना अधिक है. इस वजह से बाजार में किसानों को उनकी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक नहीं मिल पा रहा है. सरकार ने पहले एक्सपोर्ट बैन करके गेहूं क‍िसानों का नुकसान क‍िया और अब ज्यादा भंडार होने से बाजार में दाम ग‍िरने से उन्हें नुकसान पहुंच रहा है. 

जरूरत से कई गुना ज्यादा भंडार

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि अभी देश में चावल का स्टॉक 386.10 लाख टन है, जबकि जरूरत सिर्फ 135.80 लाख टन की होती है. इसी तरह, गेहूं का भंडार 217.92 लाख टन पहुंच गया है, जबकि बफर का नियम मात्र 74.60 लाख टन है.

इस आंकड़े से साफ है कि गोदाम अनाजों से छलक रहे हैं, लेकिन किसान खाली हाथ हैं. सवाल यह है कि जब सरकार के पास अनाज की इतनी भरमार है, तो किसान की फसल कौन खरीदेगा?

कटाई पूरी, खरीद अधूरी

रबी सीजन में गेहूं की बुवाई 334.17 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जिसमें से लगभग 97 प्रतिशत फसल की कटाई पूरी हो चुकी है. दालों की कटाई भी समाप्त हो गई है. धान की कटाई 59.32 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जो तमिलनाडु, केरल, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में केंद्रित है. इसके बावजूद खरीद की रफ्तार इतनी धीमी है कि किसान मजबूरी में अपनी उपज बाजार में औने‑पौने दाम पर बेचने को विवश हैं.

ताजा मामला मध्य प्रदेश का है जिसे गेहूं का सिरमौर कहा जाता है. मध्य प्रदेश का शरबती और लोकवन देश-दुनिया में मशहूर है. किसान इसे उगाने के लिए अपनी पूरी मेहनत और पूंजी झोंक देता है. लेकिन जब फसल तैयार होती है तो मंडियों में बिक्री के लिए जूझना पड़ता है. इस बार कुछ ऐसी ही हालत दिखी. मध्य प्रदेश के कई इलाकों के किसान केवल इस बात के लिए आंदोलन पर उतर गए क्योंकि उन्हें स्लॉट बुकिंग में दिक्कतें आ रही थीं. किसानों का आरोप था कि सरकार ने बुकिंग के सिस्टम को पेचीदा बना दिया, इसलिए उनकी उपज नहीं बिक पा रही है. 

किसानों का आरोप है कि सरकार एमएसपी तो घोषित करती है, लेकिन उसका फायदा तभी मिलेगा जब समय पर उपज की खरीद हो. खरीद में देरी या खरीद नहीं हो तो एमएसपी का क्या मतलब?

MSP कागजों तक सिमटा

सबसे गंभीर बात यह है कि सरकार की ओर से तय MSP जमीन पर बेअसर नजर आ रहा है. कई जगहों से ऐसी रिपोर्ट है कि गेहूं 2,530 रुपये प्रति क्विंटल पर बिक रहा है, जबकि MSP 2,585 रुपये है. धान की कीमतें गिरकर 2,294 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई हैं. मक्का की हालत और खराब है जो 1,831 रुपये प्रति क्विंटल पर खिसक गया है, जबकि MSP 2,400 रुपये है.

इतना ही नहीं, अरहर, मूंग, बाजरा और सूरजमुखी जैसी फसलें भी समर्थन मूल्य से नीचे बिक रही हैं. जब ऐसी हालत रहेगी तो किसान इन फसलों की खेती क्यों करेगा? किसान क्यों सरकार का बफर स्टॉक भरेगा?

किसान पूछ रहे हैं, फायदा किसका?

एक तरफ सरकार बफर स्टॉक के आंकड़ों पर पीठ थपथपा रही है, दूसरी तरफ किसानों को सही दाम नहीं म‍िल पा रहा. खाद, बीज, डीजल और मजदूरी की बढ़ती कीमतों के बीच MSP से नीचे बिकती फसलें किसानों को परेशान कर रही हैं. सरकार गन्ने का एफआरपी 10 रुपये बढ़ाती है जबकि खाद, डीजल जैसे इनपुट के भाव पहले से बहुत बढ़ गए. मजदूरी का रेट कहां से कहां पहुंच गया.

नीति पर बड़ा सवाल

ऐसे में सवाल है कि अगर गोदाम पहले से भरे हैं और फिर भी खरीद ढंग से नहीं हो रही, तो MSP का मतलब क्या रह जाता है? क्या समर्थन मूल्य सिर्फ फाइलों और घोषणाओं तक सीमित रहेगा? ग्रामीण इलाकों से किसानों की साफ आवाज उठ रही है—“हमें अनाज का पहाड़ नहीं, हमें हमारी फसल की सही कीमत चाहिए.” जब तक खरीद व्यवस्था मजबूत नहीं होती और MSP को सख्ती से लागू नहीं किया जाता, तब तक गोदामों की भरमार किसानों के जख्म पर नमक ही छिड़कती रहेगी.

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