
भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के तहत डीडीजीएस (DDGS) आयात को अनुमति मिलने के बाद देश के तिलहन और अनाज बाजार में नई हलचल देखने को मिल सकती है. व्यापारिक सूत्रों का कहना है कि इस फैसले का सीधा असर मक्का, सोयाबीन, सोयामील और सरसों खल की कीमतों पर पड़ सकता है, क्योंकि डीडीजीएस को पोल्ट्री फीड में सोयामील का विकल्प माना जाता है. डीडीजीएस असल में अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन प्रक्रिया का उप-उत्पाद है, जो मक्का या चावल से तैयार किया जाता है. इसका इस्तेमाल पशु और पोल्ट्री चारे में किया जाता है.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, अभी तक फीड के लिए डीडीजीएस आयात पर 15 प्रतिशत शुल्क लगता रहा है. हालांकि, उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इसका असर सभी फसलों पर एक जैसा नहीं होगा. कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CLFMA) के चेयरमैन दिव्य कुमार गुलाटी ने कहा कि मक्का पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन सोयाबीन की कीमतों पर कुछ दबाव बन सकता है.
उन्होंने कहा कि सोयामील को पूरी तरह डीडीजीएस से बदला नहीं जा सकता, क्योंकि ब्रॉयलर और लेयर पोल्ट्री के लिए सोयामील का पोषण संतुलन सबसे उपयुक्त माना जाता है. बाजार विश्लेषकों के मुताबिक, देश में पहले से ही मक्का आधारित डीडीजीएस की आपूर्ति पर्याप्त है और अब चावल आधारित डीडीजीएस भी बाजार में आ रहा है. ऐसे में बड़े पैमाने पर आयात होने से मक्का, सोयाबीन और सरसों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.
उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि आयात को सीमित रखते हुए सालाना 1 से 2 लाख टन तक ही डीडीजीएस मंगाया जाए, ताकि घरेलू बाजार पर ज्यादा असर न पड़े. व्यापार सूत्रों के अनुसार, समझौते की खबर के बाद ही सोयाबीन और सरसों के भाव में नरमी देखने को मिली है. कुछ प्रमुख मंडियों में सोयाबीन के दाम कुछ ही दिनों में 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक नीचे आए हैं. इसी तरह सरसों और मक्का के भाव में भी गिरावट दर्ज की गई है.
हालांकि, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों को देखते हुए तत्काल बड़े दबाव की आशंका नहीं जताई जा रही है. अप्रैल-मई के लिए अमेरिका से डीडीजीएस की कीमत करीब 250 डॉलर प्रति टन बताई जा रही है. परिवहन और कंटेनर खर्च जोड़ने पर इसकी लैंडिंग कीमत लगभग 27,500 रुपये प्रति टन पड़ सकती है.
इस स्तर पर आयातित डीडीजीएस भारतीय सोयामील या घरेलू डीडीजीएस पर ज्यादा दबाव नहीं बना पाएगा. दुग्ध क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का भी कहना है कि डेयरी फीड में डीडीजीएस का इस्तेमाल सीमित है, इसलिए दूध उत्पादन क्षेत्र पर इसका असर ज्यादा नहीं होगा.