
रबी सीजन की शुरुआत हो चुकी है. इस सीजन में तिलहनी फसलों में सरसों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. खाद्य तेल के मामले में देश के आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार सरसों की खेती को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं. सरसों का उत्पादन बढ़ाने के लिए कई नई किस्में भी विकसित की जा रही है. ताकि किसानों को अधिक से अधिक उत्पादन हासिल हो सके और उन्हें अच्छी कमाई हो सके. बता दें कि सरसों रबी की एक प्रमुख फसल है. मुख्य तौर पर इसकी खेती खाद्य तेल के लिए की जाती है.
सरसों की पैदावार बढ़ाने के लिए और किसानों की कमाई बढ़ाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा की तरफ से सरसों की पांच उन्नत किस्में विकसित की गई है. यह सरसों की ऐसी किस्में हैं जिसकी बुवाई खास तौर पर अक्तूबर के महीने में की जाती है. अक्तूबर महीने में सरसों की पूसा बोल्ड, पूसा ज्वालामुखी, पूसा अग्रनी, आरएलसी-1 और पीएल-501 किस्मों की खेती की जाती है. अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए 15 अक्तूबर के पहले किसानों को इन किस्मों की बुवाई करनी चाहिए.
सरसों की पूसा गोल्ड एक अधिक उपज देने वाली लोकप्रिय किस्म है. इसे आईसीएआर के पूसा संस्थान द्वारा विकसित किया गया है. इस किस्म से अधिक उपज होती है और इसका तेल भी अधिक निकलता है. इसलिए इससे किसानों को अधिक आय होती है. कम लागत में यह किस्म अधिक उपज देती है. इसका तेल भी अच्छी गुणवत्ता वाला होता है. सरसों की यह किस्म जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील है.
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सरसों यह किस्म अधिक उपज के लिए जानी जाती है. यह किस्म बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता रखती है. यह अधिक उपज देने वाली किस्म है और इससे तेल अधिक निकलता है इसलिए इस किस्म की खेती से किसानों को अच्छी कमाई होती है. इसका तेल बेहतर गुणवत्ता वाला होता है और कम लागत में यह बेहतर कमाई देती है. उत्तर भारत, पंजाब, हरियाणा, और राजस्थान में खेती करने के लिए इस किस्म को उपयुक्त माना जाता है.
सरसों की यह किस्म भी अधिक उपज देने वाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता रखने वाली किस्म है. अक्तूबर नवंबर महीने में किसान इसकी खेती कर सकते हैं. इसमें तेल की मात्रा अधिक होती है इसलिए इस किस्म से किसानों को अच्छी कमाई होती है. इसका तेल भी अच्छी गुणवत्ता वाला होता है. उत्तर भारत, पंजाब, हरियाणा, और राजस्थान में खेती करने के लिए यह किस्म उपयुक्त मानी जाती है. यह किस्म 120-130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और इसकी पैदावार 25-30 क्विंटल प्रति एकड़ है.
सरसों की पीएल 501 एक अधिक उपज देने वाली रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्म है. इसे पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किया गया है. इसका तेल बेहतर गुणवत्ता वाला होता है. इसलिए इस किस्म की खेती से किसानों को अच्छी कमाई होती है. इसका उत्पादन 25-30 क्विंटल प्रति एकड़ तक होता है. यह किस्म बुवाई के 120-125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. इसमें तेल की मात्रा 42-45 प्रतिशत तक होती है.
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सरसों की आरएलसी-1 किस्म भी अधिक उपज देने वाली किस्म है. अधिक उपज और अधिक तेल की मात्रा निकलने के कारण इस किस्म की खेती से किसानों को अच्छी कमाई होती है. इसका तेल बेहतर गुणवत्ता वाला होता है. उत्तर भारत, पंजाब, हरियाणा, और राजस्थान में खेती करने के लिए सरसों की यह किस्म उपयुक्त मानी जाती है.