
उत्तराखंड में मौसम का मिजाज लगातार बदल रहा है. कभी तेज गर्मी पड़ रही है तो कभी अचानक बारिश और ओलावृष्टि हो रही है. मौसम में हो रहे इस बड़े बदलाव ने अब वैज्ञानिकों की चिंता भी बढ़ा दी है. सबसे ज्यादा परेशानी किसानों को हो रही है, क्योंकि बदलता मौसम उनकी फसलों को नुकसान पहुंचा रहा है.
मई के महीने में इस बार मौसम ने लोगों को हैरान कर दिया. महीने की शुरुआत में जहां तापमान 20 से 22 डिग्री सेल्सियस के आसपास था, वहीं कुछ ही दिनों में यह बढ़कर 40 से 42 डिग्री तक पहुंच गया. अचानक बढ़ी गर्मी से लोगों का जीना मुश्किल हो गया है. तराई और भाबर इलाकों में लू जैसे हालात बनने लगे हैं.
उत्तराखंड के किसान पहले ही मौसम की मार झेल चुके हैं. पिछले रबी सीजन में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने गेहूं, सरसों और सब्जियों की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया था. कई जगहों पर किसानों की आधी फसल खराब हो गई थी. किसानों का कहना है कि मेहनत और पैसे लगाने के बाद भी उन्हें अच्छा उत्पादन नहीं मिल पाया.
अब किसानों की चिंता और बढ़ गई है क्योंकि मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में 90 प्रतिशत तक बारिश होने की संभावना जताई है. अगर तेज बारिश, तूफान और आंधी आती है तो खरीफ सीजन की फसलें भी खराब हो सकती हैं.
इस समय कई किसान धान, मक्का और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलों की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन मौसम में अचानक हो रहे बदलाव से किसानों को डर लग रहा है कि कहीं उनकी फसल दोबारा खराब न हो जाए.
अगर ज्यादा बारिश हुई तो खेतों में पानी भर सकता है. इससे पौधे खराब हो सकते हैं और उत्पादन कम हो सकता है. तेज हवा और आंधी आने पर फसल गिरने का भी खतरा रहता है.
किसानों का कहना है कि मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा. पहले मौसम का समय तय रहता था, लेकिन अब कभी भी बारिश और गर्मी शुरू हो जाती है.
पूर्व इसरो वैज्ञानिक और जी बी पंत कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर के मौसम वैज्ञानिक डॉ. अजीत सिंह नैन ने बताया कि आने वाले समय में भारी बारिश की संभावना है. उन्होंने कहा कि मौसम में इस तरह के बदलाव चिंता की बात हैं.
वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और जंगलों की कटाई इसके बड़े कारण हैं. लगातार पेड़ कटने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है. पहले जंगल वातावरण को ठंडा रखने में मदद करते थे, लेकिन अब हरियाली कम होती जा रही है.
विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ते शहर, प्रदूषण और जंगलों की कटाई ने उत्तराखंड के मौसम को बदल दिया है. पहाड़ों में तापमान बढ़ रहा है और इसका असर ग्लेशियरों पर भी दिखाई दे रहा है.
ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे भविष्य में पानी और मौसम दोनों पर असर पड़ सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर समय रहते पर्यावरण की रक्षा नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में मौसम और ज्यादा खतरनाक हो सकता है.
मौसम विभाग और वैज्ञानिकों ने लोगों से सतर्क रहने की अपील की है. किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे मौसम की जानकारी देखते रहें और उसी हिसाब से खेती का काम करें. विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़ लगाना, जंगल बचाना और प्रदूषण कम करना बहुत जरूरी है. तभी मौसम को संतुलित रखा जा सकता है और आने वाले समय में बड़ी परेशानियों से बचा जा सकता है. उत्तराखंड में मौसम का यह बदलता रूप सिर्फ किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि आम लोगों और पर्यावरण के लिए भी बड़ी चिंता बनता जा रहा है.
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