Fertilizer Crisis: सब्सिडी ने दी आजादी या बनाया गुलाम? केमिकल फर्टिलाइजर के विदेशी मकड़जाल में फंसी भारतीय खेती

Fertilizer Crisis: सब्सिडी ने दी आजादी या बनाया गुलाम? केमिकल फर्टिलाइजर के विदेशी मकड़जाल में फंसी भारतीय खेती

आज भारतीय खेती केमिकल फर्टिलाइजर के एक ऐसे 'विदेशी मकड़जाल' में फंस गई है, जिसने मिट्टी को नशेड़ी बना दिया है. केवल केमिकल फर्टिलाइजर पर सब्सिडी मिलने से पंजाब, यूपी और बिहार जैसे राज्यों में यूरिया का इस्तेमाल तय मानकों से 5 गुना ज्यादा हो रहा है. जहां वैज्ञानिक अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, वहां हम 20:5:1 तक पहुंच गए हैं. हैरानी की बात यह है कि इन खादों का कच्चा माल हमारे पास नहीं है; हम पूरी तरह विदेशी आयात और पश्चिम एशिया के रास्तों पर निर्भर हैं.

विदेशी आयात बोझ और खेत की घटती ताकतविदेशी आयात बोझ और खेत की घटती ताकत
जेपी स‍िंह
  • नई दिल्ली,
  • May 15, 2026,
  • Updated May 15, 2026, 4:18 PM IST

आज के समय में हमारे देश के किसानों को लगता है कि बिना केमिकल फर्टिलाइजर खेती करना मुमकिन ही नहीं है. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से गुजारिश की है कि वे इन केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल धीरे-धीरे आधा करें और 'प्राकृतिक खेती'  की ओर बढ़ें. हालांकि, सच तो यह है कि सालों से यूरिया-डीएपी की आदी हो चुके खेतों पर रसायनिक खाद अचानक से बंद कर देना व्यवहारिक नहीं लगता. लेकिन इस बात के पीछे का असली मकसद यह है कि किसान खादों का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार और समझदारी से करें. आज हमारे देश के खेतों में खाद का इस्तेमाल एक बड़ी मुसीबत बन गया है. पंजाब, हरियाणा और यूपी जैसे राज्यों में किसान वैज्ञानिक तौर-तरीकों को भूलकर यूरिया और डीएपी का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं. कायदे से मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (NPK) का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, लेकिन पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में 20:5:1 तक पहुंच गया है. यानी हम खेत में यूरिया जरूरत से पांच गुना ज़्यादा डाल रहे हैं.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी यूरिया का इस्तेमाल तय सीमा से चार गुना ज़्यादा हो रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत का राष्ट्रीय औसत 9.8:3.7:1 है, जो साफ बताता है कि हम जरूरत से दो से तीन गुना ज़्यादा केमिकल डाल रहे हैं. इसके उलट, दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरलम जैसे राज्य सही मानक 4:2:1 के सबसे करीब हैं, और महाराष्ट्र-कर्नाटक में भी खाद का इस्तेमाल काफी संतुलित है. यूरिया के इस 'अंधाधुंध' उपयोग से न केवल किसान की लागत बढ़ रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत भी 'आईसीयू' में पहुंच गई है.

विदेशी आयात बोझ और खेत की घटती ताकत

किसान को लगता है कि ज़्यादा यूरिया मतलब ज़्यादा पैदावार, लेकिन सच तो यह है कि इससे ज़मीन की ताकत खत्म हो रही है. मिट्टी अब एक नशेड़ी की तरह हो गई है, जिसे हर साल और ज़्यादा खाद चाहिए, वरना फसल उत्पादन कम हो जाता है. क्या आप जानते हैं कि जो यूरिया -डीएपी और पोटाश हम खेतो में डालते हैं, उसका कच्चा माल हमारे पास है ही नहीं? रॉक फास्फेट हो, पोटाश हो या नेचुरल गैस — इन सबके लिए भारत को दूसरे देशों के भरोसे रहना पड़ता है. आज जब पश्चिम एशिया में जंग जैसे हालात हैं और हॉर्मुज जलडमरू मध्य जैसा समुद्री रास्ता बंद होने की कगार पर है, तो खाद का संकट और गहरा गया है. दुनिया का 30% फर्टिलाइजर व्यापार इसी रास्ते से होता है. अगर सप्लाई चेन टूटी, तो हमारे पास खाद की भारी किल्लत हो जाएगी. अपनी खेती को पूरी तरह रसायनों पर टिका देना एक बड़ा 'रिस्क' है, क्योंकि हम अपनी 'फूड सिक्योरिटी' की चाबी विदेशी ताकतों के हाथ में दे रहे हैं. आत्मनिर्भर बनने के लिए हमें अपनी मिट्टी को खुद की ताकत यानी आर्गेनिक कार्बन पर खड़ा करना ही होगा.

फर्टिलाइजर सब्सिडी का 'मकड़जाल'

सरकारों ने केवल केमिकल फर्टिलाइजर पर भारी सब्सिडी देकर एक तरह से किसानों को केमिकल का आदी बना दिया. जब केवल यूरिया और डीएपी पर सरकार का सपोर्ट और सब्सिडी मिले और कम दाम मिलने लगे, तो किसानों ने गोबर की खाद, कंपोस्ट और हरी खाद का इस्तेमाल बंद कर दिया. पहले हम अमोनियम सल्फेट जैसी खादें इस्तेमाल करते थे जिनमें सल्फर भी होता था, लेकिन सब्सिडी के चक्कर में सब यूरिया के पीछे भागने लगे. इससे सरकार का कीमती विदेशी पैसा पानी की तरह बह रहा है और बदले में हमें मिली ऊसर बनती हमारी मिट्टी. सब्सिडी ने किसानों को 'शॉर्टकट' तो दिया, लेकिन लंबी रेस के लिए मिट्टी को अपाहिज बना दिया. आज जरूरत इस बात की है कि हम सब्सिडी के इस 'मकड़जाल' से बाहर निकलें और पुराने दौर की नेचुरल खादों के इस्तेमाल को बढ़ाए. केमिकल फर्टिलाइजर को धीरे कम करें क्योंकि एकाएक कम कर देना पूरी तरह व्यवहारिक नहीं है जिससे विदेशी पैसा और खेत की मिट्टी दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं. 

खेती में यूरिया का ओवरडोज़ और पैसे की बर्बादी 

वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि जब किसान खेत में यूरिया की बोरी डालता है, तो उसका सिर्फ एक-तिहाई करीब 33% हिस्सा ही पौधों के काम आता है. बाकी दो-तिहाई हिस्सा या तो गैस बनकर आसमान में उड़ जाता है या फिर रिसकर जमीन के नीचे वाले पानी में मिल जाता है. इसका मतलब है कि किसान का 100 रुपये का खर्चा असल में सिर्फ 33 रुपये का फायदा पहुंचा रहा है. बाकी का पैसा तो 'वेस्ट' हो रहा है. साथ ही हमारे पीने के पानी को भी जहरीला बना रहा है. अब वक्त आ गया है कि हम केवल बोरी वाली यूरिया की जगह जैविक, कार्बनिक और रासायनिक खाद को 1:2:2 के सही बैलेंस में इस्तेमाल करें, तो मिट्टी को जरूरी कार्बन मिलेगा और सूक्ष्म जीव दोबारा जिंदा हो पाएंगे. इसके साथ ही घुलनशील फर्टिलाइजर का इस्तेमाल बढ़ाना होगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि 80 फीसदी पौधे इसका उपयोग करते हैं और पैदावार भी बढ़ती है.

कंपनियों को नहीं, सीधे किसान को मिले सब्सिडी

बहुत से विशेषज्ञो का कहना है कि इस पूरे संकट का सबसे 'परफेक्ट' हल यह है कि खाद बाजार को सरकारी कंट्रोल से आजाद कर दिया जाए. जब तक खाद सस्ती मिलेगी, इसकी बर्बादी और कालाबाजारी नहीं रुकेगी. सरकार को चाहिए कि वह सब्सिडी का पैसा खाद कंपनियों को देने के बजाय सीधे किसान के बैंक खाते में डाल दे. जब खाद की कीमत इंटरनेशनल मार्केट के बराबर होगी, तो किसान उसे 'सोने' की तरह तौलकर इस्तेमाल करेगा. वह फिजूलखर्ची बंद करेगा और जैविक खादों की तरफ मुड़ेगा. इससे सरकार का आर्थिक बोझ कम होगा और फर्टिलाइजर ब्लैक मार्केटिग का खेल भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. किसान को अपनी मर्जी का मालिक होना चाहिए कि वह उस पैसे से यूरिया खरीदे या गोबर की खाद, जैविक खाद या धुलनशील फर्टिलाइजर, जिसमें उसको फायदा दिखे वह खरीदेगा.

सब्सिडी का 'शॉर्टकट' पड़ रहा महंगा

दुनिया भर में चल रहे तनाव और बदलते मौसम ने हमें एक मौका दिया है कि हम अपनी खेती के मॉडल को दोबारा से डिजाइन करें. 'पीएम-किसान' और खाद सब्सिडी की रकम को मिलाकर एक मज़बूत 'डायरेक्ट इनकम सपोर्ट' स्कीम शुरू करनी चाहिए. इससे किसान की जेब में सीधा पैसा पहुंचेगा और वह बाजार से अपनी ज़रूरत के हिसाब से सही पोषण खरीद पाएगा. खेती में सुधार करने में अब और देरी करना देश की सेहत और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ होगा. हमें एक ऐसा सिस्टम बनाना है जहां किसान सिर्फ 'यूरिया' पर निर्भर न रहे, बल्कि वह अपनी मिट्टी का डॉक्टर खुद बने. यही वो रास्ता है जिससे हम आने वाली पीढ़ियों को उपजाऊ जमीन और ज़हर-मुक्त भोजन दे पाएंगे.

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