करोड़ों की जमीन, कौड़ियों का मुनाफा...कैसे बचेंगे किसानों के खेत?

करोड़ों की जमीन, कौड़ियों का मुनाफा...कैसे बचेंगे किसानों के खेत?

क्या कोई भी समझदार व्यापारी 1,50,00,000 रुपये की व्यावसायिक संपत्ति लगाकर साल में मात्र 69,751 रुपये की कमाई करना पसंद करेगा? व्यापारिक नियमों के अनुसार यह दिवालिया होने जैसा है. घाटे का सौदा है, लेकिन भारत के सभी प्रमुख महानगरों और दिल्ली-एनसीआर के बाहरी इलाकों में रहने वाले लाखों किसानों की कड़वी हकीकत यही है. आइए, समझते हैं कि बड़े शहरों के आसपास तेजी से क्यों बिक रही है कृषि भूमि?

farm land selling issuefarm land selling issue
ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Oct 28, 2026,
  • Updated Oct 28, 2026, 1:47 PM IST

भारत के किसी भी तेजी से बढ़ते महानगर जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई या लखनऊ के बाहरी छोर पर निकल जाइए. जहां कभी लहलहाती फसलें दिखती थीं, वहां आज कंक्रीट के जंगल, एक्सप्रेसवे की चमक और उन सबके बीच एक मायूस कर देने वाला बोर्ड दिखाई देता है कि यह कृषि भूमि बिकाऊ है. सतही तौर पर देखने वाले समाजशास्त्री और शहरी योजनाकार इसे शहरीकरण की स्वाभाविक प्रक्रिया कहकर खारिज कर देते हैं. 

उनका मानना होता है कि किसान मोटी रकम के लालच में या अपनी जीवनशैली बदलने के लिए जमीन बेच रहे हैं. लेकिन जब आप इस संकट की परतों को उखाड़ते हैं, तो एक कड़वा सच सामने आता है. जमीन बेचने का यह सिलसिला कोई शौक नहीं, बल्कि एक गहरी आर्थिक मजबूरी और देश की कृषि नीतियों में मौजूद एक भयानक 'नीतिगत झोल' का भी नतीजा है.

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था इस समय एक नए तरह के संकट से गुजर रही है. वह पीढ़ी जो जमीन को अपनी मां कहती थी, वो आज उसे बेचने को मजबूर है और वह पीढ़ी जो इस देश का भविष्य है यानी युवा, वह खेत में पैर रखने को भी तैयार नहीं है. जानिए आखिर ऐसा क्यों हैं?

कंपनियों को छूट, किसानों से लूट

इस पूरे संकट की धुरी कृषि उपज से किसानों को मिलने वाला बेहद कम फायदा है. कम फायदे के पीछे सरकार का वह फॉर्मूला है जिसके आधार पर देश में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय किया जाता है. भारत में कृषि लागत और मूल्य आयोग वर्तमान में ए-2 प्लस एफएल फॉर्मूले का उपयोग करके न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना करता है. इस लागत में किसान द्वारा बीज, खाद, कीटनाशक, ईंधन, सिंचाई और किराए के मजदूरों पर किया गया सीधा नकद खर्च शामिल होता है. 

पारिवारिक श्रम लागत में किसान के परिवार द्वारा खेत में किए गए शारीरिक श्रम का एक अनुमानित मूल्य जोड़ा जाता है. लेकिन, यहीं, एक बड़ा नीतिगत झोल भी आता है. इस फॉर्मूले में सरकार किसान की अपनी खुद की मालिकाना जमीन का अनुमानित किराया और खेती के बुनियादी ढांचे में लगी उसकी मोटी पूंजी पर लगने वाले ब्याज को पूरी तरह से गायब कर देती है. यानी उसे खर्च मस नहीं जोड़ती. सरकारी फाइलों में इसकी कीमत शून्य मान ली जाती है.

अब इसकी तुलना किसी भी रजिस्टर्ड कंपनी, कॉर्पोरेट घराने या एक छोटी सी दुकान से कीजिए. जब कोई उद्यमी अपनी कंपनी की लेखा बही बनाता है या अपने उत्पाद की बिक्री कीमत तय करता है तो वह व्यावसायिक नियमों के तहत कुछ खर्चों को अनिवार्य रूप से जोड़ता है. इसमें आंतरिक किराया शामिल है, जिसके तहत अगर फैक्ट्री या ऑफिस मालिक की अपनी जमीन या बिल्डिंग में है तो भी उसका एक अनुमानित बाजार किराया खर्च में दिखाया जाता है.

इसके साथ ही अवसर लागत भी जोड़ी जाती है, जिसके तहत व्यापार में जो करोड़ों रुपये की पूंजी लगाई गई है, उस पर अगर बैंक से ब्याज मिलता तो वह भी नुकसान या लागत के रूप में दर्ज होता है. कंपनियों को कानूनन यह अधिकार है कि वे इन खर्चों को दिखाकर अपना टैक्स बचाएं और अपना मुनाफा मार्जिन तय करें. लेकिन जब बात देश के किसानों की आती है तो नियम बदल जाते हैं. यही वह नीतिगत विसंगति है, जिसे सी-2 लागत कहा जाता है और जिसे स्वामीनाथन आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य का आधार बनाने की पुरजोर सिफारिश की थी, लेकिन आज दो दशक बाद भी यह सिफारिश फाइलों में दफन है.

किसान आखिर करे क्या?

आज के दौर में जब देश का पढ़ा-लिखा ग्रामीण युवा अपनी पुश्तैनी खेती को देखता है, तो वह पारंपरिक भावनाओं से ऊपर उठकर एक आधुनिक व्यवसायी की तरह निवेश पर रिटर्न की गणना करता है. महानगरों के 50 से 100 किलोमीटर की परिधि में आज एक एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि का औसत बाजार भाव कम से कम डेढ़ करोड़ रुपये हो चुका है. आइए इस डेढ़ करोड़ रुपये की संपत्ति पर मिलने वाले दोनों विकल्पों के व्यावहारिक और वास्तविक डेटा का मुकाबला करते हैं.

पहला रास्ता, अगर किसान एक एकड़ जमीन पर साल भर खून-पसीना बहाकर धान और गेहूं दोनों फसलें उगाए और सरकार उसे पूरी फसल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य भी दे दे, तो उसकी आय  कितनी होगी?

  • धान से कुल आय (26 क्विंटल उत्पादन × 2,441 रुपये मूल्य) = 63,466 रुपये.
  • गेहूं से कुल आय (21 क्विंटल उत्पादन × 2,585 रुपये मूल्य) = 54,285 रुपये.
  • साल भर की कुल आय = 1,17,751 रुपये.
  • इसमें से बीज, खाद, दवाई, जुताई, पानी और कटाई का नगद खर्च कम से कम 48,000 रुपये आता है.
  • सब खर्च काटकर साल भर का असली शुद्ध मुनाफा = मात्र 69,751 रुपये.
  • यानी महीने का 6,000 रुपये से भी कम.

दूसरा रास्ता, जमीन बेचकर बैंक में फिक्स डिपॉजिट करना है. अगर एक किसान अपनी एक एकड़ जमीन को डेढ़ करोड़ रुपये में बेचता है और उस पैसे को भारत के किसी सुरक्षित बैंक में फिक्स डिपॉजिट कर देता है, तो वर्तमान ब्याज दरों यानी औसत 7.5 प्रतिशत सालाना के अनुसार उसका गणित बहुत सीधा है. इससे उसे कुल सालाना निश्चित ब्याज 11,25,000 रुपये मिलेगा. जो महीने का 93,750 रुपये बैठता है. इसमें जोखिम जीरो है. न बाढ़ का डर, न सूखे की चिंता, न कीटों का हमला, न मंडी के बिचौलियों की मार और न ही रात रात भर जागकर कड़कती ठंड में खेतों में पानी लगाने की मजबूरी.

कहने का मतलब यह है कि जो जमीन खुले बाजार में डेढ़ करोड़ रुपये की बेशकीमती संपत्ति है, वह खेती करने पर साल भर की कठोर मेहनत के बाद अपने मालिक को एक अकुशल मजदूर की न्यूनतम दिहाड़ी से भी कम मुनाफा दे पा रही है. किसान को अपनी ही जमीन पर खेती करने के कारण सालाना 10 लाख रुपये से अधिक का सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है. साफ है कि लोग शौक से नहीं, बल्कि इस गणितीय हार के कारण अपने खेत बेच रहे हैं. खेती से नई पीढ़ी का यह पलायन कोई सामाजिक फैशन नहीं, बल्कि एक बेहद तार्किक और सोचा-समझा आर्थिक निर्णय है.

खेत बचाने का क्‍या है रास्‍ता?

इसी गंभीर नीतिगत विसंगति को दूर करने और खेती से हो रहे पलायन को रोकने के लिए अब देश भर में शहरी क्षेत्रों के आसपास की विशिष्ट खेती की मुहिम पर जोर दिया जा रहा है. इसी कड़ी में हरियाणा के पूर्व कृषि मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ ने 23 अक्टूबर को झज्जर के हसनपुर गांव में एक विशाल कृषि नेतृत्व शिखर सम्मेलन का आयोजन किया. इसका थीम पेरी-अर्बन एग्रीकल्चर रहा. जिसमें किसानों से अपील की गई  कि वो बड़े शहरों के नजदीक स्थित खेतों में शहरों की मांग के अनुसार सब्जियां, फल, डेयरी उत्पाद और फूलों की आधुनिक खेती करें. 

इससे उन्हें गेहूं-धान की खेती के मुकाबले अधिक फायदा होगा. खेत बचाने की यह अच्छी कोशिश लगती है, लेकिन  यह समस्या सिर्फ सब्जियों और फलों की खेती करने मात्र से ही खत्म नहीं होगी. क्योंकि, सब्जियों-फलों की खेती में सबसे बड़ा रिस्क दामों का अचानक क्रैश होना है. दाम पूरे मिल भी जाए तो सालाना 3-4 लाख रुपये से ज्यादा इनकम नहीं होगी.

ऐसे में अगर देश में खेतों को बिकने से बचाना है तो सरकारों को न्यूनतम रिटर्न की गारंटी तय करनी होगी, खेती की जमीन का किराया लागत में जोड़ना होगा, ताकि किसान को घाटा न हो. महानगरों को जोड़ने वाले सभी प्रमुख हाईवे पर सरकारी कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग यूनिटें लगानी होंगी, ताकि दाम गिरने पर किसान अपनी सब्जियां कौड़ियों के भाव बेचने के बजाय स्टोर कर सकें.

ये भी पढ़ें: विदेशी कंपनियों के आगे क्यों झुका देश का विज्ञान? बीटी के झांसे में कैसे तबाह हुई कपास की देसी क्रांति?

MORE NEWS

Read more!