
महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है, लेकिन अब सरकार इस संकट के आंकड़ों को भी छिपाने लगी है. सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, राज्य में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच 54 महीनों में 13,928 किसानों ने आत्महत्या की है, यानी हर दिन 8 से ज्यादा किसान.
यह जानकारी यंग व्हिसलब्लोअर्स फाउंडेशन के कार्यकर्ता जीतेंद्र घाडगे द्वारा मांगी गई थी. हैरानी की बात यह है कि ये आंकड़े भी पहली बार में नहीं, बल्कि पहली अपील के बाद और सिर्फ कुल संख्या के रूप में दिए गए. जिलावार और माहवार ब्योरा देने से साफ इनकार कर दिया गया.
घाडगे का कहना है, "पिछले 10 वर्षों में यह पहली बार है जब राहत एवं पुनर्वास विभाग ने जिलावार किसान आत्महत्या के आंकड़े देने से मना किया है."
विभाग की ओर से दी गई एकमुश्त तालिका के मुताबिक,
इसका मतलब है कि लगभग 30% शोकाकुल परिवारों को सरकार से एक रुपया भी नहीं मिला.
जीतेंद्र घाडगे ने जिलावार और माहवार आंकड़ों के लिए RTI दाखिल की थी. 24 जुलाई को जन सूचना अधिकारी ने जवाब दिया कि "जानकारी प्रत्येक जिलाधिकारी कार्यालय के पास है, वहीं से लें", जबकि यही विभाग पिछले कई सालों से जिलावार आंकड़े देता आ रहा है.
इसके बाद 18 अगस्त को घाडगे ने प्रथम अपील दाखिल की. 8 सितंबर को सुनवाई हुई और तब जाकर सिर्फ पूरे राज्य की एक टेबल थमा दी गई. जिलावार विवरण, जो उनकी याचिका का मुख्य आधार था, देने से इनकार कर दिया गया. घाडगे का आरोप है कि यह इनकार वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के दबाव में किया गया.
विशेषज्ञों का मानना है कि जिलावार आंकड़ों के बिना यह पता लगाना नामुमकिन है कि संकट किस जिले में सबसे ज्यादा गहरा है, कौन सी सरकारी योजना फेल हो रही है और राहत सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों तक पहुंच भी रही है या नहीं.
जीतेंद्र घाडगे ने कहा, "मैंने इस मुद्दे पर पत्र लिखते हुए, RTI दाखिल करते हुए एक दशक बिता दिया है. मैं अधिकारियों से कहता रहा हूं कि आंकड़ों से परे देखिए, हर मौत के पीछे एक इंसान है. अपनी जान लेने वाला हर किसान एक ऐसा परिवार छोड़ जाता है जिसकी दुनिया रातों-रात तबाह हो जाती है. कर्ज की जिम्मेदारी विधवा पर आ जाती है जो सोचती है कि बच्चों को कैसे खिलाएगी, और माता-पिता को ऐसे दुख के साथ जीना पड़ता है जिसे कोई मुआवजा नहीं मिटा सकता."
उन्होंने आगे कहा, "सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि इतने सालों बाद भी हम बुनियादी पारदर्शिता के लिए लड़ रहे हैं. अगर सरकार हर त्रासदी को नहीं रोक सकती, तो कम से कम यह सुनिश्चित करे कि कोई भी पीड़ित परिवार बेसहारा न छूटे. मृत किसानों की बढ़ती संख्या निराशाजनक है, लेकिन आज तो आंकड़ों को भी छुपाया जा रहा है."
घाडगे ने सरकार को पत्र भी लिखे और पत्र में उन्होंने दो बड़े सुझाव दिए थे-
मुख्यमंत्री कार्यालय ने एक मिनट के भीतर ईमेल मिलने की पुष्टि भी की और उसे कृषि विभाग को भेज दिया, लेकिन घाडगे का कहना है कि आज तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.
उनके पत्र के तीन साल बाद राज्य के अपने आंकड़े बताते हैं कि संकट जस का तस बना हुआ है, और अब तो यह सवाल भी अनुत्तरित है कि यह संकट सबसे ज्यादा कहां गहरा है.(दीपेश डी. त्रिपाठी की रिपोर्ट)