
खीरा उद्योग के लिए आने वाला समय चुनौती से भरा हो सकता है, क्योंकि भारत के सबसे बड़े बाजार अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ़ के कारण वित्त वर्ष 2026 में खीरे के निर्यात में लगभग 10 फीसदी की गिरावट आने की संभावना है. हालांकि, रुपये के कमजोर होने से निर्यातकों को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन कुल मात्रा में कमी आना तय माना जा रहा है. बता दें कि ये एक छोटा खीरा है, जिससे अचार बनाया जाता है.
इंडियन गेरकिन एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जी.एम. विनोद ने कहा कि निर्यात की मात्रा में कुछ गिरावट आएगी. डॉलर के मजबूत होने से टर्नओवर के मामले में कुछ भरपाई हो सकती है, लेकिन भेजी जाने वाली मात्रा कम हो जाएगी.
उन्होंने कहा कि भारतीय खीरे के निर्यात के लिए अमेरिका सबसे बड़ा बाजार है. विनोद ने कहा कि अमेरिका में हमारी हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है. हम यूरोप और रूस जैसे अन्य बाजारों में भी विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, इन बाजारों से हमें सही कीमत नहीं मिल पा रही है, इसलिए यह हमारे लिए एक समस्या है.
एपीडा के आंकड़ों पर नजर डालें तो, चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-अक्टूबर के दौरान खीरे का निर्यात 169.71 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो एक साल पहले इसी अवधि में 159.02 मिलियन डॉलर था. मात्रा के लिहाज से निर्यात 1.69 लाख टन रहा, जो पिछले साल 1.48 लाख टन था. वहीं, पूरे वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान गेरकिन निर्यात ने रिकॉर्ड 306.72 मिलियन डॉलर और 2.89 लाख टन का आंकड़ा छुआ था.
भारत से गेरकिन यानी अचार वाले खीरे का निर्यात मुख्य रूप से 'बल्क' और 'बोतलबंद' दोनों रूपों में किया जाता है. निर्यातक प्रदीप पूवैया ने बताया कि अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव के कारण इस साल कुल निर्यात में 10 फीसदी तक की कमी आ सकती है. चूंकि खरीदारों के लिए दूसरे देशों पर शिफ्ट होना आसान नहीं है, इसलिए इस अतिरिक्त शुल्क का बोझ फिलहाल खरीदार और निर्यातक मिलकर उठा रहे हैं.
बता दें कि इस खास खीरे की खेती मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (अनुबंध खेती) के तहत की जाती है. चूंकि घरेलू बाजार में इसकी मांग न के बराबर है, इसलिए पूरी फसल निर्यात पर निर्भर है. बाजार की अनिश्चितता को देखते हुए निर्यातकों ने अपने उत्पादन में कटौती कर दी है. जी.एम. विनोद ने कहा कि उत्पादन में थोड़ी कटौती की गई है और हम दूसरे बाजारों में जाने की कोशिश कर रहे हैं. इस बीच निर्यातक सरकार से राहत की उम्मीद कर रहे हैं. पूवैया ने बताया कि वे व्यापार नीति में घोषित 3 प्रतिशत ब्याज छूट का इंतजार कर रहे हैं.