
उत्तर प्रदेश सरकार और इंडिया टुडे ग्रुप की संयुक्त पहल के तहत ‘किसान तक’ का किसान कारवां पहुंचा ऐतिहासिक शहर मेरठ के कुसावली गांव पहुंचा. यहां बड़ी संख्या में किसानों की भागीदारी देखने को मिली. प्रदेश के 75 जिलों की इस विशेष कवरेज में यह 70वां पड़ाव रहा. कार्यक्रम में कृषि विभाग के अधिकारियों ने सरकार की विभिन्न महत्वपूर्ण योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी और किसानों को उनका लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया. वहीं गन्ना विकास विभाग के अधिकारियों ने किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ सह-फसली खेती अपनाने के फायदे बताए, जिससे उनकी आय में बढ़ोतरी हो सके.
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से खेती को अधिक लाभकारी बनाने के उपाय समझाए. साथ ही फसल प्रणाली अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने खेती में नए प्रयोगों और नवाचारों के जरिए आय बढ़ाने के तरीके साझा किए. इस दौरान किसानों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और विशेषज्ञों से अपनी समस्याओं पर चर्चा की. कार्यक्रम ने किसानों को नई दिशा देने का काम किया और खेती को लाभ का मजबूत माध्यम बनाने की प्रेरणा दी.
पहले चरण में कृषि विज्ञान केंद्र मेरठ के वैज्ञानिक डॉ. शुभम आर्य ने बताया कि आज के समय में किसानों को पारंपरिक खेती के साथ नए प्रयोग अपनाने होंगे. सहफसली खेती (Intercropping) एक बेहतर विकल्प है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गन्ने के साथ पॉपुलर (Poplar) की खेती की जा सकती है. इससे किसान को 5 वर्षों तक गन्ना, गेहूं जैसी फसलों से नियमित आय मिलती रहेगी और जब पॉपुलर तैयार होगा, तब एकमुश्त बड़ा मुनाफा मिलेगा. इससे मृदा स्वास्थ्य सुधरता है और उत्पादन भी बढ़ता है.
दूसरा चरण में भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम के वैज्ञानिक डॉ. अमृतलाल मीणा ने बताया कि खेती में फसल विविधीकरण बेहद जरूरी है. उन्होंने गन्ने के साथ मूंगफली की सहफसली खेती का उदाहरण दिया. किसान विनोद सैनी के मॉडल का जिक्र करते हुए बताया कि एक ही समय में दो फसलों से लाभ मिल रहा है, जिससे आय में बढ़ोतरी हो रही है.
तीसरे चरण में धानुका एग्रीटेक लिमिटेड के विशेषज्ञ मनु बहादुर ने कहा कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हुई है. उन्होंने “माइकोर सुपर” जैसे उत्पाद के उपयोग पर जोर दिया, जिससे मिट्टी में पोषक तत्व बढ़ते हैं और जड़ों का विकास बेहतर होता है. इससे पौधे नाइट्रोजन और फास्फोरस का बेहतर उपयोग कर पाते हैं और उत्पादन में सुधार होता है.
चौथा चरण में इफको के उप महाप्रबंधक ब्रजवीर सिंह ने बताया कि नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे उर्वरक किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. ये न केवल उत्पादन बढ़ाते हैं बल्कि मृदा स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाते हैं. लिक्विड डीएपी को बीज उपचार में अत्यंत प्रभावी बताया गया और नैनो यूरिया के सही उपयोग की जानकारी भी किसानों को दी गई.
पांचवां चरण में गन्ना विभाग के अधिकारी सुधीर सिंह ने कहा कि पश्चिम उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था गन्ने पर आधारित है, लेकिन अब समय आ गया है कि किसान गन्ने के साथ अन्य सहफसली मॉडल अपनाएं. लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो रही है और उत्पादन प्रभावित हो रहा है. सहफसली खेती से इस समस्या का समाधान संभव है.
छठे चरण में मोदीपुरम स्थित बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रितेश शर्मा ने बताया कि बासमती चावल भारत की वैश्विक पहचान है. यह 150 से अधिक देशों में निर्यात होता है और इससे 60,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है. उन्होंने कहा कि संतुलित उर्वरक और पानी के सही उपयोग से बासमती का उत्पादन बेहतर होता है और इसमें कीटनाशकों की आवश्यकता भी कम होती है.
सातवें चरण में चंबल फर्टिलाइजर लिमिटेड के एस. के. सिंह ने बताया कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान को देखते हुए फसल पैटर्न बदलना जरूरी है. उन्होंने कहा कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में गन्ने के साथ सब्जी, मूंगफली और अन्य फसलों की खेती तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों को अधिक लाभ मिल रहा है.
आठवें चरण में कृषि विभाग के विकास पवार ने बताया कि सहफसली खेती अपनाने से लागत कम होती है और मुनाफा बढ़ता है. उन्होंने किसानों को बताया कि कृषि विभाग द्वारा अरहर, मूंग, उड़द और धान के बीज अनुदान पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं. किसानों को इन योजनाओं का लाभ उठाकर अपनी आय बढ़ानी चाहिए.
नौवें चरण में धानुका एग्रीटेक लिमिटेड के संस्थापक डॉ. आर. जी. अग्रवाल ने कृषि क्षेत्र में जल संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया. उन्होंने कहा कि “खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में” रहना चाहिए. इस अभियान को वे वर्ष 2005 से चला रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप आज कई गांवों में तालाब बनाकर पानी का संरक्षण किया जा रहा है.
उन्होंने नकली बीज, कीटनाशक और उर्वरकों के खिलाफ भी आवाज उठाई और मांग की कि बाजार में बिकने वाले हर उत्पाद पर QR कोड होना चाहिए, जिससे किसानों को असली और नकली की पहचान करने में मदद मिल सके. उन्होंने बताया कि धनुका द्वारा राजस्थान में बनाए गए 6 चेक डैम से वहां की खेती में सकारात्मक बदलाव आया है.
दसवें चरण में क्षेत्र के प्रगतिशील किसानों को सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया गया. सम्मानित किसानों में विनय कुमार, राजेश कुमार, विनोद कुमार सैनी, रामबीर पाल, मनोज पाल, पवन सैनी, रवि दत्त, योगेंद्र राणा, अनिल चौधरी, अशोक सिरोही, राजकुमार सैनी, श्यामवीर सैनी, राजन सिरोही और सुनील फौजी शामिल रहे. वहीं, कार्यक्रम के अंत में चिराग कृषि फार्म के संचालक विनोद सैनी ने मंच को संबोधित किया.
उन्होंने बताया कि आज एक बड़ी नौकरी छोड़कर आज कृषि कार्य में जुड़े हुए हैं और उन्होंने एक एफपीओ बनाया है, जिसकी बदौलत वह किसानों की सेवा कर रहे हैं और किसानों को अपनी फसल का बेहतर मूल्य दिलाने का काम भी कर रहे हैं. उन्होंने सभी आए हुए अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया.
कार्यक्रम के अंतिम 11वें चरण में लकी ड्रॉ का आयोजन किया गया, जिसमें ₹500 के 10 पुरस्कार वितरित किए गए. इस लकी ड्रॉ में पहला पुरस्कार दुर्गेश कुमार को मिला, जबकि दूसरा पुरस्कार सुनीता ने जीता.