
नीला थोथा यानी कॉपर सल्फेट की कीमतों में इस साल तेज बढ़ोतरी ने कॉफी और सुपारी उगाने वाले किसानों की लागत को अचानक बढ़ा दिया है. पिछले साल जहां इसका भाव करीब 270-290 रुपये प्रति किलो था, वहीं अब यह 450 रुपये से ऊपर है. यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब किसान मॉनसून से पहले फफूंदनाशी छिड़काव की तैयारी करते हैं. यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन ऑफ साउदर्न इंडिया (UPASI) की कॉफी कमेटी के चेयरमैन सहदेव बालकृष्ण ने बताया कि कॉपर सल्फेट बोर्डो मिश्रण तैयार करने के लिए जरूरी है. इसका इस्तेमाल खासतौर पर अरबिका कॉफी में लीफ रस्ट और ब्लैक रॉट जैसे फंगल रोगों को रोकने के लिए किया जाता है. ज्यादा बारिश वाले इलाकों में यह छिड़काव बेहद जरूरी होता है.
बिजनेसलाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक ग्रोअर्स फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष बी एस जयराम ने कहा कि इनपुट लागत बढ़ने के साथ मजदूरों की कमी भी बड़ी चुनौती बन रही है. चुनाव के दौरान अपने गृह राज्य लौटे प्रवासी मजदूर अभी पूरी तरह वापस नहीं आए हैं, जिससे छिड़काव और अन्य जरूरी कृषि कार्य प्रभावित हो रहे हैं. सहदेव बालकृष्ण ने यह भी कहा कि प्रवासी मजदूर धीरे-धीरे लौट रहे हैं. आने वाले कुछ हफ्तों में ही स्थिति साफ होगी. अगर मजदूरों की संख्या सामान्य नहीं हुई तो छंटाई, छिड़काव, खाद डालने और निराई जैसे कार्यों में देरी हो सकती है.
इधर, ऑल इंडिया अरेका नट ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष महेश पुच्छप्पडी ने बताया कि कॉपर सल्फेट की कीमत इस साल लगभग दोगुनी हो गई है. सुपारी बागानों में मॉनसून के दौरान फल सड़न रोग को रोकने के लिए फफूंदनाशी छिड़काव जरूरी होता है, जिसमें कॉपर सल्फेट मुख्य घटक है. बाजार में कुछ विकल्प मौजूद हैं, लेकिन छोटे किसान उन्हें अपनाने से हिचक रहे हैं, क्योंकि उन्हें इनके असर को लेकर भरोसा नहीं है. इसलिए वे पारंपरिक उपायों पर ही निर्भर रहना चाहते हैं.
वहीं, सेंट्रल अरेकनट एंड कोकोआ मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कोऑपरेटिव (कैंपको) लिमिटेड के अध्यक्ष एस आर सतीशचंद्र ने बताया कि सहकारी संस्था अपने सदस्य किसानों को 450 रुपये प्रति किलो की रियायती दर पर कॉपर सल्फेट उपलब्ध करा रही है. अन्य किसानों के लिए इसकी कीमत करीब 490 रुपये प्रति किलो है. उन्होंने कहा कि स्टॉक पर्याप्त है और उपलब्धता को लेकर चिंता की जरूरत नहीं है.
कॉपर सल्फेट की बढ़ती कीमत, मजदूरों की कमी और फसल रोगों के खतरे ने किसानों के लिए इस सीजन को चुनौतीपूर्ण बना दिया है. मॉनसून से पहले जरूरी छिड़काव करना अनिवार्य है, लेकिन बढ़ती लागत के कारण किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बन रहा है. आने वाले समय में इसका असर उत्पादन और किसानों की आमदनी पर पड़ सकता है.