
लखनऊ स्थित केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI) में लखनऊ ऊसर और सो़डिक भूमि के सुधार पर दो दिवसीय 5 से 6 फरवरी को किसान प्रशिक्षण का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को यह सिखाना था कि कैसे वे अपनी बंजर या कम उपजाऊ ऊसर जमीन को वैज्ञानिक तरीकों से उपजाऊ बना सकते हैं. वैज्ञानिकों ने बताया कि अब ऊसर जमीन अभिशाप नहीं है, बल्कि सही तकनीक, सही किस्म के बीजों और जैविक खादों के उपयोग से यहां धान-गेहूं के अलावा फल, फूल और सब्जियों की बंपर पैदावार ली जा सकती है.
उत्तर प्रदेश कृषि शोध अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और संस्थान के वैज्ञानिकों ने 'हैलो मिक्स' जैसे नए जैव-फॉर्मूलेशन, सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों और बागवानी के लाभों पर विस्तार से चर्चा की. सरकार की विभिन्न योजनाओं और वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन से किसान अपनी लागत कम करके और फसलों का विविधीकरण करके अपनी आर्थिक स्थिति को काफी मजबूत कर सकते हैं.
उत्तर प्रदेश कृषि शोध अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ संजय सिंह ने किसानों को प्रोत्साहित करते हुए बताया कि प्रदेश सरकार ऊसर भूमि सुधार के लिए कई प्रभावी योजनाएं चला रही है. उन्होंने जोर देकर कहा कि परंपरागत खेती के बजाय किसानों को वैज्ञानिकों द्वारा विकसित ऊसर-सहनशील किस्मों का ही चयन करना चाहिए, क्योंकि ये बीज विशेष रूप से लवणीय मिट्टी के लिए तैयार किए गए हैं. सामान्य बीजों की तुलना में ये किस्में विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर अंकुरण और पैदावार देती हैं. इसके साथ ही, उन्होंने मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए गोबर की खाद और कम्पोस्ट के अधिक से अधिक प्रयोग की सलाह दी. महानिदेशक ने स्पष्ट किया कि अगर किसान केवल धान और गेहूं के चक्र में फंसे रहेंगे, तो उनकी आय सीमित रहेगी. इसलिए, उन्हें अब दलहन, तिलहन और नकदी फसलों की ओर रुख करना चाहिए, ताकि वे अपनी जमीन से हर मौसम में भरपूर मुनाफा कमा सकें.
डॉ संजय सिंह ने उत्तर प्रदेश के बदलते आर्थिक परिदृश्य का जिक्र करते हुए बताया कि अयोध्या, वाराणसी और मथुरा जैसे धार्मिक स्थलों पर पर्यटकों की भारी भीड़ बढ़ने से फल और फूलों की मांग में जबरदस्त इजाफा हुआ है. वर्तमान में इस मांग को पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों से भारी मात्रा में फूल और फल मंगाए जा रहे हैं, जो महंगे दामों पर बिकते हैं. यह हमारे प्रदेश के किसानों के लिए एक बहुत बड़ा मौका है. किसान अपनी ऊसर सुधार वाली जमीन पर फूलों और फलों की खेती शुरू कर सकते हैं, जिससे उन्हें सीधा और बड़ा बाजार मिलेगा. वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केन्द्रों से संपर्क बनाए रखें, ताकि उन्हें खाद और कीटनाशकों के सही इस्तेमाल की जानकारी मिलती रहे. इससे न केवल अनावश्यक खर्चों में कमी आएगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी लंबे समय तक बरकरार रहेगी और किसानों को अपनी मेहनत का उचित दाम मिल सकेगा.
सीएएएसआरआई लखनऊ के हेड डॉ. अनिल कुमार दुबे ने अपनी अध्यक्षता में बताया कि संस्थान ने ऐसी कई तकनीकें और प्रजातियां विकसित की हैं, जो ऊसर जमीन को भी बेहतर आय का जरिया बना सकती हैं. उत्तर प्रदेश के हजारों किसान पहले ही इन तकनीकों को अपनाकर अपनी बंजर जमीन को उपजाऊ बना चुके हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि ऊसर भूमि में आंवला, बेर, बेल, अमरूद और नींबू जैसे फलों के बाग लगाना बहुत फायदेमंद साबित होता है. ये पौधे ऊसर मिट्टी को आसानी से सहन कर लेते हैं और कम पानी में भी अच्छी फसल देते हैं. डॉ. दुबे ने 'इंटरक्रॉपिंग' यानी फसलों के बीच में खाली जगह का उपयोग करने की सलाह दी, जहां किसान फलों के पेड़ों के बीच दूसरी छोटी फसलें उगाकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं. प्रगतिशील किसानों के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सही तकनीकी सलाह लेकर कोई भी किसान अपनी बंजर जमीन से लाखों की कमाई कर सकता है.
मिट्टी और जल प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. अतुल कुमार सिंह ने एक बहुत अहम बात बताई कि ऊसर जमीन में सिंचाई का तरीका सामान्य जमीन से अलग होना चाहिए. उन्होंने बताया कि ऊसर खेतों में कभी भी बहाव सिंचाई यानी फ्लड इरिगेशन नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे जमीन की ऊपरी सतह पर जमे लवण सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंच जाते हैं, जिससे पौधे सूखने लगते हैं. इसके बजाय, किसानों को ड्रिप या स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों को अपनाना चाहिए. साथ ही, उन्होंने मिट्टी की जांच (सॉइल टेस्टिंग) पर विशेष जोर दिया. मिट्टी की जांच से यह पता चलता है कि खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है, जिससे किसान केवल जरूरी खाद ही डालता है और उसका पैसा बर्बाद नहीं होता. रबी की फसलों की कटाई के बाद मिट्टी के उपचार का सबसे सही समय होता है, जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादकता को बढ़ाकर किसान अपनी गरीबी दूर कर सकते हैं.
प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संजय अरोड़ा ने संस्थान द्वारा विकसित क्रांतिकारी 'हैलो मिक्स' (Halo Mix) तकनीक के बारे में जानकारी दी. यह एक तरल जैव-फॉर्मूलेशन है, जिसमें ऐसे बैक्टीरिया होते हैं जो नमक को सोखने और मिट्टी को उपजाऊ बनाने में मदद करते हैं. इसके प्रयोग से नाइट्रोजन और जिंक जैसे महंगे उर्वरकों पर निर्भरता कम हो जाती है और फसल की वृद्धि तेज होती है. डॉ. अरोड़ा ने हरदोई जिले के सफल प्रोजेक्ट का उदाहरण दिया, जहां एचसीएल के सहयोग से हजारों हेक्टेयर ऊसर जमीन को सुधारा गया है. उन्होंने हरी खाद के लिए 'ढैंचा' की खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया और कहा कि सरकार को मार्च-अप्रैल में ही ढैंचा के बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए. ढैंचा न केवल ऊसर जमीन, बल्कि सामान्य खेतों के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है. जैविक खेती और इन आधुनिक तकनीकों के संगम से भारत की 67 लाख हेक्टेयर लवण प्रभावित भूमि को फिर से हरा-भरा बनाया जा सकता है.