
धनपत राय यानी मुंशी प्रेमचंद को आधुनिक हिन्दी गद्य का एक महत्वपूर्ण लेखक माना जाता है. उनकी कहानियाँ और उपन्यास सरलता में पगे होते थे लेकिन हमारे गाँव-समाज की वास्तविकता कहते थे. ग्रामीण संस्कृति और रहन-सहन पर इतनी अच्छी पकड़ शायद ही किसी और लेखक में देखने को मिले. प्रेमचंद के बाद फणीश्वरनाथ रेणु ही थे जिनकी कहानियों में पूर्वांचल के गांवों-और किसानों का बेहतरीन चित्रण दिखाई देता है.
लेकिन मुंशी प्रेमचंद इस बात में रेणु जी से अलग हैं कि उनकी कहानियों का किसान देश के किसी भी कोने का हो सकता है. वे छोटे-छोटे प्रसंगों के जरिये एक बड़ी बात कह जाते थे. इसका जीवंत उदाहरण है उनकी कालजयी कृति ‘दो बैलों की कथा’.
हीरा और मोती नाम के दो बैलों के जरिये ना सिर्फ वे जानवरों की दुर्दशा का चित्रण करते हैं, बल्कि ग़ुलामी और आज़ादी के बीच का फ़र्क, आज़ादी के लिए संघर्ष जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को बहुत भावपूर्ण तरीके से व्यक्त करते हैं.
‘हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता” हीरा कहता है तो मोती जवाब देता है, “इसलिए कि हम इतने सीधे हैं!”
या फिर कहानी की शुरुआत में गधे का विवरण एक सरल कथन से कहीं गहरे मायने रखता है – ‘कदाचित सीधापन संसार के लिए उचित नहीं है.
‘पूस की रात’ एक और उल्लेखनीय कहानी है जिसमें हल्कू के जरिये उन कठिन परिस्थितियों का सजीव वर्णन है –ऐसा कि भरी गर्मी में आप पूस की रात की ठिठुरन महसूस कर सकें. जब हल्कू अपनी पत्नी मुन्नी से कंबल के लिए बचाए गए पैसे मांगता है ताकि अपना कुछ कर्ज़ चुका सके तो मुन्नी चिढ़ कर कहती है , “मैं कहती हूँ तुम खेती छोड़ क्यों नहीं देते. मर मर कर काम करो. पैदावार हो तो उस से कर्ज़ अदा करो. चलो छुट्टी हुई, कर्ज़ अदा करने के लिए तो हम पैदा ही हुये हैं. ऐसे खेती से बाज़ आए. मैं रुपये न दूँगी, न दूँगी!” मुन्नी का ये कथन इतने सालों बाद आज भी किसानों के संदर्भ में प्रासंगिक है. लेकिन अंत में हल्कू का यह निश्चय कि वो किसानी नहीं छोड़ेगा- यह भी किसानों की जीवटता दर्शाता है.
ये भी पढ़ें: The Levelling: बाढ़ और बिखरे-टूटे परिवार के बीच खुद को तिनका-तिनका बटोरते किसान की दास्तां
सबसे हृदय विदारक कहानी है ‘कफ़न’ जो वैसे तो किसान की बात नहीं करती लेकिन गांवों में दलितों के जीवन, उनकी जीवन शैली और अंतहीन गरीबी का सशक्त चित्रण है. वहीं ‘सवा सेर गेंहू’ शंकर के माध्यम से यह बतलाती है कि किस तरह अपने सीधेपन की वजह से किसानों का, उनकी आस्था का शोषण किया जाता है.
‘राह-ए-नजात’ झींगर महतो और बुधिया के बीच की अनबन के माध्यम से प्रतिशोध के दुष्परिणामों को बतलाती है और ये भी, कि किस तरह आर्थिक संकट दो कट्टर विरोधियों को एक ही स्तर पर ला खड़ा करता है और यही उनके बीच सौहार्द का कारण भी बन जाता है. ऐसी अनेक छोटी-बड़ी कहानियाँ हैं जो मुंशी जी ने ग्रामीण पृष्ठभूमि को उजागर करते हुये लिखीं.
मानवीय भावनाएं और भारतीय ग्रामीण समाज की परम्पराएँ –चाहें वे अच्छी हों या बुरी – प्रेमचंद की कहानियों में बगैर किसी लाग-लपेट के कही गई हैं. ‘गोदान’ प्रेमचंद का एक कालजयी उपन्यास है जो एक किसान होरी की एक गाय पालने और गोदान करने की इच्छा के इर्द-गिर्द घूमता है. ऐसा लगता है मानो यह उपन्यास आज के किसान की कहानी ही कह रहा हो. परिवार की मर्यादा की रक्षा करने, कर्ज़ से जूझने और गोदान करने की इच्छा के बीच झूलता होरी इक्कीसवीं सदी के भारतीय किसान की ही बात करता प्रतीत होता है.
मुंशी प्रेम चंद की खासियत ये है कि वे एक शहरी भाषा (जो उस वक्त उर्दू मिली हुई हिन्दी थी, जिसे हम हिंदुस्तानी कह सकते हैं) में उत्तर भारत के गांवों की आत्मा का चित्रण करते थे, अपने किरदारों और सरल कहानियों के माध्यम से. कहानी सरल सी प्रतीत होती थी, लेकिन बहु-आयामी भी. उनकी भाषा भी एक खास ग्रामीण लहजा लिए हुये थी –स्पष्ट, सीधी और चोट करती हुई.
अगर किसानों को लेकर नीति बनाने वाली संस्थाएं किसानों की सही छवि जानना चाहती हैं, उनकी समस्याओं की झलक पाना चाहती हैं , तो वे आज भी मुंशी जी की रचनाओं से अपनी समझ बना सकती हैं. यही तो होता है, एक लेखक का कालजयी होना!