
आज 31 जुलाई है. साल 1880 में आज ही के दिन वाराणसी के लमही गांव में धनपत राय यानी मुंशी प्रेमचंद का जन्म हुआ था. प्रेमचंद ने महलों की चकाचौंध को छोड़कर अपनी कलम का रुख देश के धूल-धूसरित गांवों और खेतों की तरफ मोड़ा. उन्होंने हिंदी साहित्य को तिलिस्म और जादुई दुनिया से बाहर निकालकर खेत की मेढ़ पर ला खड़ा किया. आज उनके जन्म के 146 साल बाद जब हम साल 2026 के हाईटेक भारत को देखते हैं, जहां खेती में ड्रोन, जीपीएस और एआई की बातें हो रही हैं, तब एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा होता है कि क्या प्रेमचंद की कहानियों का वह बेबस किसान आज सचमुच बदल चुका है? या सिर्फ किरदार बदल गए हैं और दर्द वही है? आइए, मुंशी प्रेमचंद के साहित्य के आईने में आज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों के जमीनी हालात पर बात करते हैं.
मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कालजयी कहानी 'सवा सेर गेहूं' में दिखाया था कि कैसे सीधा-साधा किसान 'शंकर' अपने घर आए साधु को भोजन कराने के लिए गांव के 'विप्र महाराज' से मात्र सवा सेर (लगभग सवा किलो) गेहूं उधार लेता है. शंकर सालभर बाद खेत की कटाई के समय पाँच सेर अनाज लौटा भी देता है, लेकिन वह खाते में नाम काटने को कहना भूल जाता है. सात साल बाद विप्र महाराज अचानक दावा करते हैं कि ब्याज जोड़कर वह कर्ज साढ़े पांच मन हो चुका है. अंत में, मात्र सवा सेर गेहूं के बदले शंकर को साठ रुपये का कर्जदार बनाकर 3 रुपये महीने पर जीवनभर के लिए बंधुआ मजदूर बना लिया जाता है. उसकी मृत्यु के बाद उसका बेटा भी उसी लाला के यहां गुलामी करने पर मजबूर होता है.
वही स्थिति उनके सबसे महान उपन्यास 'गोदान' में 'होरी' की है. होरी आजीवन पांच-दस रुपयों के कर्ज के चक्रव्यूह में घिसटता रहता है और अंत में मजदूरी करते-करते सड़क पर दम तोड़ देता है. होरी की कहानी यह दिखाती है कि कैसे धार्मिक अंधविश्वास, सामाजिक रूढ़ियां और साहूकारों का लालच मिलकर एक भले और मेहनती इंसान को जीते जी मार डालते हैं.
आज के दौर में गांवों से पारंपरिक सूदखोर और लाला थोड़े कम जरूर हुए हैं, उनकी जगह को-ऑपरेटिव बैंकों, किसान क्रेडिट कार्ड और माइक्रो-फाइनेंस कंपनियों ने ले ली है. लेकिन कर्ज का जाल आज भी उतना ही जानलेवा है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के हालिया आंकड़े बताते हैं कि भारत में आज भी 50 फीसदी से अधिक किसान परिवार कर्ज के बोझ तले दबे हैं. संस्थागत लोन न मिल पाने के कारण छोटे और सीमांत किसान आज भी स्थानीय साहूकारों से भारी ब्याज पर लोन लेने को मजबूर हैं. कर्ज न चुका पाने के कारण आज भी देश के किसी न किसी हिस्से से किसान की आत्महत्या की खबर आती है, जो यह चीख-चीख कर कहती है कि प्रेमचंद का 'शंकर' आज भी मरा नहीं है.
प्रेमचंद की कहानी 'पूस की रात' भारतीय कृषि के उस दर्द को बयां करती है जिसे आज भी हर छोटा किसान महसूस करता है. कड़कड़ाती ठंड में पुराना फटा कंबल ओढ़े 'हलकू' अपने वफादार कुत्ते 'जबरा' के साथ खेत की रखवाली करता है. नीलगायों का झुंड उसकी पूरी फसल चर जाता है, लेकिन तंगहाली और कड़ाके की ठंड से थका हलकू सुबह अपनी उजड़ी फसल देखकर दुखी होने के बजाय राहत की सांस लेता है कि चलो, अब इस जाड़े में रात को यहां सोना तो नहीं पड़ेगा.
एक सदी बाद आज भारत का 'हलकू' ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की सबसे भयानक मार झेल रहा है. साल 2026 में मौसम का चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है. कभी भीषण गर्मी से फसलें समय से पहले सूख जाती हैं, तो कभी पूस और माघ के महीनों में बेमौसम भारी बारिश और ओलावृष्टि पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है.
इसके साथ ही, आवारा और जंगली पशुओं जैसे नीलगाय और छुट्टा सांड द्वारा फसल नष्ट किए जाने की जो समस्या प्रेमचंद ने 'पूस की रात' में लिखी थी, वह आज उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बनी हुई है. किसान रात-रात भर जागकर कटीले तारों के बीच अपने खेतों की रखवाली कर रहे हैं. आज का किसान भी फसल बर्बाद होने पर उसी तरह शून्य में ताकता है, जैसे कभी हलकू ताकता था.
प्रेमचंद ने अपनी कहानी 'बलिदान' में दिखाया था कि एक किसान के लिए उसकी जमीन सिर्फ आजीविका का साधन नहीं होती, बल्कि उसका आत्मसम्मान, उसकी इज्जत और उसकी मां होती है. कहानी में हरखू की मृत्यु के बाद जमींदार द्वारा ऊंचे नजराने (टैक्स) की मांग के कारण उसका बेटा 'गिरधारी' अपनी पैतृक जमीन से बेदखल हो जाता है. अपनी जान से प्यारी जमीन हाथ से निकल जाने के बाद गिरधारी मानसिक रूप से टूट जाता है और एक रात गांव छोड़कर हमेशा के लिए लापता हो जाता है. बाद में गांव वाले उसके उसी खेत की मेढ़ पर उसकी आत्मा को भटकते हुए देखते हैं.
आज विकास की अंधी दौड़, हाईवे, एक्सप्रेस-वे और शहरीकरण के नाम पर कृषि योग्य उपजाऊ जमीनों का लगातार अधिग्रहण हो रहा है. हालांकि अब मुआवजे के नियम बदले हैं, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के हाथ से जब जमीन निकलती है, तो वे सीधे तौर पर 'किसान' से 'अकुशल मजदूर' बन जाते हैं. अपनी ही जमीन पर मालिकाना हक खोकर शहरों की ओर पलायन करने वाले इन मजदूरों की आंखों में आज भी वही 'गिरधारी' वाला दर्द तैरता दिखाई देता है.
'गोदान' का पूरा ताना-बाना होरी के एक छोटे से सपने के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिसमें वह अपने दुआर पर एक पछाईं गाय (पश्चिम की अच्छी नस्ल की गाय) खूंटे से बंधी देखना चाहता है, क्योंकि उस दौर में पशुधन ही एक किसान की सबसे बड़ी पूंजी और सामाजिक समृद्धि का प्रतीक होता था. इसी गाय को पाने की चाहत में वह कर्ज के आत्मघाती जाल में फंस जाता है, जहां महाजनों का अंतहीन ब्याज और जमींदारी व्यवस्था का दोहरा शोषण उसकी कमर तोड़ देता है.
विडंबना यह है कि उसकी यह बुनियादी इच्छा न केवल आर्थिक तंगहाली की भेंट चढ़ती है, बल्कि सामाजिक पाखंड का शिकार भी बनती है-जहां उसका अपना भाई ईर्ष्या में गाय को जहर दे देता है और धर्म के ठेकेदार उस पर भारी जुर्माना थोप देते हैं. प्रेमचंद ने होरी की इस त्रासदी के जरिए यह दिखाया है कि कैसे एक शोषक और ढोंगी समाज एक सीधे-सादे किसान को जीते जी तिल-तिल मरने पर मजबूर कर देता है और अंत में उसकी लाश पर भी 'गोदान' का पाखंड रचता है.
आज खेती की सबसे बड़ी समस्या है बढ़ती लागत और घटती आय. डीजल, खाद, कीटनाशक और उन्नत बीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में किसान को अपनी फसल का सही दाम नहीं मिल पाता. बाजार के बिचौलियों का जो जाल प्रेमचंद के समय था, वह आज भी कंपनियों और मंडियों के घालमेल के रूप में मौजूद है. टमाटर, प्याज और आलू उगाने वाला किसान कभी एक रुपये किलो फसल बेचने पर मजबूर होता है तो कभी उसे सड़क पर फेंक देता है. पशुपालन भी आज चारे की बढ़ती कीमतों और दूध के सही दाम न मिलने के कारण छोटे किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है.
मुंशी प्रेमचंद सिर्फ अतीत के लेखक नहीं हैं, वे हमारे वर्तमान के सबसे बड़े आलोचक हैं. जब हम उनकी 146वीं जयंती मना रहे हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी भारत की आत्मा यानी 'गांव और किसान' आज भी बुनियादी संकटों से जूझ रहे हैं. प्रेमचंद ने कभी सामाजिक बुराइयों को छिपाया नहीं, बल्कि उन्हें आईना दिखाया.
आज उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि नीतियां बनाते समय एसी कमरों से बाहर निकलकर, खेत की उस मेढ़ पर खड़े आखिरी किसान के दर्द को समझा जाए, जिसे प्रेमचंद ने आज से सौ साल पहले पहचान लिया था. जब तक देश का अन्नदाता 'हलकू' और 'शंकर' की तरह बेबस रहेगा, तब तक प्रेमचंद का साहित्य प्रासंगिक रहेगा और हमें हमारी कमियों पर झकझोरता रहेगा.