
गुजरात विधानसभा के मॉनसून सत्र के आखिरी दिन, राज्य में बारिश की कमी का संकट और किसानों की बढ़ती चिंताएं राजनीतिक बहस का मुख्य मुद्दा बन गईं. प्रश्नकाल के दौरान, आम आदमी पार्टी के विधायक गोपाल इटालिया ने पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के कार्यकाल में जारी एक सर्कुलर का हवाला देते हुए सूखे के आकलन की सरकारी नीति पर सवाल उठाए.
इटालिया ने कहा कि सर्कुलर में यह प्रावधान था कि अगर किसी इलाके में लगातार चार हफ्तों तक बारिश नहीं होती है, तो वहां सूखा घोषित किया जा सकता है. चूंकि कुछ तालुकाओं में यह स्थिति बन चुकी थी, इसलिए उन्होंने पूछा कि क्या सरकार उन इलाकों में सूखा घोषित करेगी और राहत के उपाय शुरू करेगी.
इस मांग का जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने कहा कि गुजरात सरकार भारत सरकार के 'सूखा प्रबंधन मैनुअल' का पालन करती है. "इसलिए, सूखा घोषित करने का कोई भी फैसला सिर्फ बारिश की अवधि के आधार पर नहीं, बल्कि तय दिशानिर्देशों के अनुसार लिया जाएगा."
इस बीच, कांग्रेस विधायक विमल चुडासमा ने उन इलाकों में किसानों का कर्ज माफ करने की मांग की जहां कम बारिश के कारण फसलें बर्बाद हो गई थीं.
प्रभावित किसानों पर आर्थिक बोझ का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने सरकार से तुरंत राहत देने पर विचार करने का आग्रह किया.
पटेल ने इस चिंता को स्वीकार किया और कहा कि विमलभाई द्वारा उठाया गया मुद्दा सही है. उन्होंने कहा कि तय व्यवस्था के तहत किसानों के कर्ज पर कोई ब्याज नहीं लगता है और सदन को भरोसा दिलाया कि सरकार फसल की बर्बादी के मामले में उचित फैसला लेगी.
हालांकि, कांग्रेस विधायक अमित चावड़ा ने इस चर्चा पर सावधानी बरतने की बात कही. उन्होंने तर्क दिया कि ब्याज माफी की बात से किसानों और आम जनता के बीच गलतफहमी पैदा हो सकती है.
चावड़ा ने बताया कि कर्ज माफी आम तौर पर 'नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स' (NPA) के तौर पर दिए जाने वाले कर्ज से जुड़ी होती है, इसलिए सरकार को किसी भी प्रस्तावित राहत के दायरे और शर्तों के बारे में साफ-साफ बताना चाहिए.
सरकारी बयान के अनुसार, 3 सितंबर, 2026 तक गुजरात में औसत मौसमी बारिश का 94.43% दर्ज किया गया था.
इसके बावजूद, सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात के कई जिलों में अभी भी बारिश की कमी बनी हुई है. सरकार ने स्पष्ट किया कि सिर्फ बारिश की कमी से ही सूखे की स्थिति तय नहीं होती है. इसके बजाय, अधिकारी कई वैज्ञानिक पैमानों का आकलन करते हैं, जिनमें बुवाई का तरीका, 'नॉर्मलाइज़्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स' (NDVI), मिट्टी की नमी और भूजल का स्तर शामिल है.
नतीजतन, सूखे का सवाल बारिश के किसी एक पैमाने के बजाय अलग-अलग वैज्ञानिक आकलन से जुड़ा हुआ है.
एक तरफ किसान राहत की मांग कर रहे हैं और विपक्ष सूखे से निपटने के सरकार के तरीकों पर सवाल उठा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विधानसभा के आखिरी दिन कानूनी कामकाज के साथ-साथ गुजरात में बारिश की कमी के संकट पर तीखी राजनीतिक बहस भी होने की उम्मीद है.