जले हाथों को देखा तो बना दी मखाना फोड़ने की मशीन, जानें ‘मखाना मैन’ की कहानी

जले हाथों को देखा तो बना दी मखाना फोड़ने की मशीन, जानें ‘मखाना मैन’ की कहानी

मखाना की खेती को आसान बनाना आज भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती है. पानी में होने वाली इस खेती में मेहनत और लागत दोनों ज्यादा होती हैं. ऐसे में एक शख्स ने किसानों की मुश्किलों को समझकर मखाना खेती को आसान बनाने की दिशा में काम किया और अपनी अलग पहचान बनाई. मखाना मैन के नाम से पहचाने जाने वाले इस शख्स की कहानी और उनका काम काफी दिलचस्प है.

मखाना मैन मखाना मैन
संदीप कुमार
  • Noida,
  • Sep 11, 2026,
  • Updated Sep 11, 2026, 12:04 PM IST

मखाना आज देश-दुनिया में सुपरफूड के तौर पर पहचान बना चुका है, लेकिन इसे तैयार करने की पारंपरिक प्रक्रिया कभी बेहद कठिन और जोखिम भरी थी. मखाने के बीज को भूनने और फोड़ने के दौरान मजदूरों के हाथ जल जाते थे. कई जगह पूरी रात बीज फोड़ने की आवाज गूंजती रहती थी. इसी समस्या को खत्म करने का संकल्प एक युवा इंजीनियर ने लिया और IIT खड़गपुर में मखाना फोड़ने की मशीन बनाने की शुरुआत की.  यह कहानी है बिहार के डॉ. एस.एन. झा की जिन्हें मखाना के क्षेत्र में उनके लंबे काम की वजह से ‘मखाना मैन’ के नाम से जाना जाता है.

उन्होंने 1988 में IIT खड़गपुर में पढ़ाई के दौरान मखाना पर काम शुरू किया था. उनका मकसद सिर्फ रिसर्च पेपर लिखना नहीं, बल्कि ऐसी मशीन बनाना था, जो मखाना तैयार करने वाले किसानों और मजदूरों के हाथों को राहत दे सके.  डॉ. एस.एन. झा ने यह दिलचस्प जानकारी 'किसान तक' के पॉडकास्ट अन्नगाथा (Annagatha) में दी.

गांव के मजदूरों के जले हाथों ने बदल दी दिशा

डॉ. झा ने बताया कि M.Tech के दौरान जब उन्हें रिसर्च का विषय चुनना था, तो वह अपने गांव पहुंचे और मिथिला के स्थानीय लोगों से पूछा कि उनके इलाके की सबसे बड़ी समस्या क्या है. इसी बातचीत में उन्हें मखाना फोड़ने की पारंपरिक प्रक्रिया की मुश्किलों के बारे में पता चला. उन्होंने मखाना फोड़ने वाले अनुभवी मजदूरों से मुलाकात की. जब उन्होंने मशीन बनाने की बात कही तो मजदूरों ने अपने हाथ दिखाए. उनके हाथों पर फोड़े और जलने के निशान थे. यही दृश्य उनके लिए निर्णायक साबित हुआ. तब उन्होंने तय किया कि अब इसी समस्या का समाधान निकालना उनका लक्ष्य है.

उन्होंने कहा कि उस समय मखाने के बारे में वैज्ञानिकों को भी ज्यादा जानकारी नहीं थी. यहां तक कि उन्हें मखाने का अंग्रेजी और वैज्ञानिक नाम भी पता नहीं था. तब उन्होंने IIT खड़गपुर की लाइब्रेरी में इसके बारे में जानकारी खोजी और प्रोफेसरों की मदद ली. इसके बाद उन्हें पता चला कि मखाने का वैज्ञानिक नाम Euryale ferox और अंग्रेजी नाम Gorgon nut है. डॉ. झा ‘Foxnut’ नाम को लेकर भी सवाल उठाते हैं और वैज्ञानिक किताबों में इस्तेमाल होने वाले नाम को ज्यादा सही मानते हैं.

पहली मशीन बनी, लेकिन काम नहीं किया

मखाना फोड़ने की मशीन बनाना डॉ. झा के लिए आसान नहीं था, उन्होंने IIT खड़गपुर की वर्कशॉप में तकनीकी स्टाफ की मदद से कई डिजाइन तैयार किए. मशीन बन तो गई, लेकिन सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि मखाना ठीक से फूट ही नहीं रहा था. उधर उनकी थीसिस जमा करने की तारीख भी करीब आती जा रही थी और मशीन की समस्या दूर होने का नाम नहीं ले रही थी. आखिरकार डॉ. झा ने अपने पुराने डेटा और प्रयोगों को फिर से जांचना शुरू किया. इसी दौरान उन्हें एक अहम बात पता चली.

दरअसल, समस्या मशीन में नहीं, बल्कि मखाना भूनने वाले रोस्टर में थी. उन्हें पता चला कि गांव में लोग मखाना भूनने के लिए कास्ट आयरन की कड़ाही का इस्तेमाल करते थे, जबकि उनके रोस्टर में दूसरी सामग्री लगी थी. इससे गर्मी और नमी का सही तरीके से आदान-प्रदान नहीं हो पा रहा था. रोस्टर की सामग्री बदलते ही नतीजे भी बदलने लगे. फिर एक दिन मशीन में 100 मखाने के बीज डाले गए और संयोग से सभी 100 बीज मखाने में बदल गए. यही वह पल था जब लंबे समय से चल रहे प्रयोग को बड़ी सफलता मिली और डॉ. झा की मशीन ने आखिरकार अपनी क्षमता साबित कर दी.

IIT के डायरेक्टर ने गर्म मखाना उठाकर खाया

मशीन के सफल प्रदर्शन के बाद IIT खड़गपुर के तत्कालीन डायरेक्टर के.एल. चोपड़ा को भी इसे देखने के लिए बुलाया गया. मशीन चालू हुई तो उसमें से मखाना निकला. डॉ. झा ने बताया कि उन्हें अंदर से डर था कि कहीं मशीन फिर काम करना बंद न कर दे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. डायरेक्टर ने खुद गर्म मखाना उठाकर खाया और उसकी तारीफ की. इसके बाद डॉ. झा के काम को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला. इसी मशीन पर आगे और काम हुआ और बाद में रोस्टर को भी मोटर से चलने वाला बनाया गया.

नौकरी के बजाय चुनी PhD और मखाने पर काम

मशीन तैयार करने के बाद डॉ. एस. एन. झा को IIT में नौकरी का मौका मिला, लेकिन उस समय के डायरेक्टर ने उन्हें नौकरी के बजाय PhD करने की सलाह दी. उनका मानना था कि मखाना फोड़ने की मशीन अभी शुरुआती दौर में है और इसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने लायक बनाने के लिए और रिसर्च की जरूरत है. इसके बाद डॉ. झा ने 1990 में PhD में दाखिला लिया और मखाने पर अपना शोध जारी रखा. उन्होंने मखाने के बीज की मजबूती, गर्मी को सोखने की क्षमता और दूसरी खासियतों का अध्ययन किया. बाद में उन्होंने मखाने की ग्रेडिंग पर भी काम किया. इसका मकसद मखाने को उसकी क्वालिटी के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटना था, ताकि अच्छी क्वालिटी के मखाने की सही कीमत मिल सके और किसानों और उत्पादकों को बेहतर फायदा हो.

मखाने से बनी इंस्टेंट खीर ने भी बनाई पहचान

मखाने पर डॉ. झा का काम सिर्फ मखाना फोड़ने और उसकी प्रोसेसिंग तक ही सीमित नहीं रहा. NDRI करनाल में काम करने के दौरान उन्होंने मखाने से इंस्टेंट खीर मिक्स बनाने पर भी काम शुरू किया. शुरुआत में संस्थान में मखाने पर रिसर्च करने को लेकर सवाल भी उठे, लेकिन डॉ. झा ने अपने पुराने काम को जारी रखा. उन्होंने ऐसा पाउडर तैयार किया, जिसे गर्म या ठंडे पानी में मिलाकर बिना पकाए ही खीर बनाई जा सकती थी. इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया गया और इसके लिए पेटेंट के लिए भी आवेदन किया गया.

मखाने पर डॉ. झा का शोध यहीं नहीं रुका. उन्होंने मखाने की पैदावार से लेकर प्रोसेसिंग, रोस्टिंग, ग्रेडिंग और उससे नए उत्पाद बनाने तक अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया. आज मखाना भारत के साथ-साथ दूसरे देशों में भी पहुंच चुका है और इसकी खेती का दायरा भी बढ़ा है. लेकिन इसके पीछे सिर्फ मखाने की बढ़ती लोकप्रियता की कहानी नहीं है. इसके पीछे एक ऐसे इंजीनियर की दशकों की मेहनत और जिद भी है, जिन्होंने गांव में मखाना निकालने वाले मजदूरों के जले हाथ देखे और इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान खोजने का फैसला किया.

MORE NEWS

Read more!