
केंद्र सरकार ने खरीफ मार्केटिंग सीजन 2026-27 के लिए 14 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है, लेकिन इस बार सबसे ज्यादा चर्चा मक्का और मूंग के MSP को लेकर हो रही है. सरकार ने जहां कुछ फसलों के MSP में ठीक-ठाक बढ़ोतरी की है, वहीं मक्का और मूंग के दाम में बेहद कम इजाफा किया गया है. ऐसे में किसानों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि बढ़ती लागत के मुकाबले यह बढ़ोतरी कितनी राहत दे पाएगी. बता दें कि सरकार कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिश पर एमएसपी का ऐलान करती है.
सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सूरजमुखी, कपास, रामतिल और तिल के MSP में की गई है. लेकिन, मक्का और मूंग किसानों को इस फैसले से खास राहत मिलती नहीं दिख रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, खरीफ मार्केटिंग सीजन 2025-26 में मक्का का MSP 2400 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे 2026-27 के लिए बढ़ाकर 2410 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है. यानी सिर्फ 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है. यह बढ़ोतरी प्रति किलो के हिसाब से केवल 10 पैसे बैठती है.
प्रतिशत के हिसाब से देखें तो मक्का के MSP में करीब 0.42 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई है. इसी तरह मूंग का MSP पिछले सीजन में 8768 रुपये प्रति क्विंटल था, जिसे अब बढ़ाकर 8780 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है. यानी सरकार ने इसमें केवल 12 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा किया है. प्रति किलो के हिसाब से यह बढ़ोतरी करीब 12 पैसे की बनती है. प्रतिशत के आधार पर देखें तो मूंग के MSP में लगभग 0.14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
फसल की लागत के आंकड़ों की तुलना करें तो खरीफ मार्केटिंग सीजन 2025-26 में मक्का की अनुमानित उत्पादन लागत 1508 रुपये प्रति क्विंटल थी और MSP 2400 रुपये तय किया गया था यानी लागत पर करीब 59 प्रतिशत का अंतर था. अब 2026-27 में मक्का की लागत बढ़कर 1544 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई, लेकिन MSP केवल 10 रुपये बढ़ाकर 2410 रुपये किया गया. ऐसे में लागत बढ़ने के मुकाबले MSP में लाभ का अंतर घटकर करीब 56 प्रतिशत रह गया है.
वहीं, मूंग फसल के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है. पिछले सीजन 2025-26 में सरकार ने मूंग की लागत 5845 रुपये प्रति क्विंटल आंकी थी और MSP 8768 रुपये तय किया था. इस बार MSP भले ही सिर्फ 12 रुपये बढ़ाकर 8780 रुपये किया गया, लेकिन सरकार ने अनुमानित लागत घटाकर करीब 5453 रुपये प्रति क्विंटल मानी है. इसी वजह से MSP और लागत के बीच का अंतर बढ़कर करीब 61 प्रतिशत दिख रहा है. यानी मूंग में MSP की बढ़ोतरी बेहद मामूली रही, लेकिन कम लागत के अनुमान के चलते आंकड़ों में फायदा बड़ा दिखाई दे रहा है.
एक बार को अगर खाद, डीजल के स्थिर दाम को छोड़ भी दें तो बीज, मजदूरी और सिंचाई की लागत लगातार बढ़ रही है. ऐसे में MSP में इतनी मामूली बढ़ोतरी से खेती की लागत और आमदनी के बीच का अंतर कम होता नहीं दिख रहा है. खासकर मक्का उत्पादक राज्यों और दलहन उत्पादक किसानों के बीच इस फैसले को लेकर नाराजगी की चर्चा शुरू हो गई है.
बता दें कि पिछले साल जब मक्का के एमएसपी में अच्छी बढ़ाेतरी की गई थी, तब भी किसानों को बाजार में सही भाव नहीं मिला. यहां तक कि कई जगहों पर लागत से भी कम भाव मिला था और उन्हें महीनों की मेहनत के बाद भारी नुकसान का सामना करना पड़ा. इसका असर यह हुआ कि कुछ राज्यों ने केंद्र से फसल खरीद की मांग उठाई और सरकार खरीद के माध्यम से किसानों को हल्की राहत देनी पड़ी, लेकिन यह उपाय भी सभी किसानों को राहत देने के लिए नाकाफी है.
सरकार हर साल खरीफ और रबी सीजन में बुवाई से पहले MSP का ऐलान करती है, ताकि किसानों को फसल चयन में सहूलियत मिल सके. लेकिन, इस बार MSP बढ़ोतरी के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया कि सभी फसलों को समान राहत नहीं मिली है. जहां कुछ फसलों को 500 रुपये से अधिक का इजाफा मिला, वहीं मक्का और मूंग किसानों के हिस्से में बेहद सीमित बढ़ोतरी आई है. सरकार ने सूरजमुखी के MSP में 622 रुपये प्रति क्विंटल, कपास में 557 रुपये, रामतिल में 515 रुपये और तिल में 500 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है.