कम लागत, ज्यादा पैदावार: FOM ब्लेंडिंग से बदलेगी खेती की तस्वीर, खाद आयात पर भी लगेगा ब्रेक

कम लागत, ज्यादा पैदावार: FOM ब्लेंडिंग से बदलेगी खेती की तस्वीर, खाद आयात पर भी लगेगा ब्रेक

FOM ब्लेंडिंग के जरिए रासायनिक खाद में 10% जैविक खाद मिलाने की योजना से भारत में खेती सस्ती, मिट्टी उपजाऊ और खाद आयात में कमी लाने की तैयारी की जा रही है.

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क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • May 13, 2026,
  • Updated May 13, 2026, 1:59 PM IST

देश में खेती को सस्ती, टिकाऊ और मुनाफेदार बनाने के लिए अब सरकार नई रणनीति पर काम कर रही है. जहां एक तरफ इथेनॉल ब्लेंडिंग की चर्चा रही, वहीं अब रासायनिक खादों में जैविक खाद मिलाने यानी FOM (Fermented Organic Manure) ब्लेंडिंग पर जोर बढ़ रहा है. इसका मकसद न सिर्फ किसानों की लागत कम करना है बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारना और खाद के आयात पर निर्भरता घटाना भी है.

क्या है FOM और क्यों है खास

FOM यानी फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर, गोबर, खेती के अवशेष और जैविक कचरे से तैयार होने वाली खाद है. इसे खास माइक्रोबियल प्रक्रिया से बनाया जाता है, जिससे इसमें मौजूद पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश) जल्दी फसलों को मिलते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, यह खाद मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाती है, पानी धारण करने (मिट्टी में पानी का जमा रहना) की क्षमता सुधारती है और माइक्रोबियल एक्टिविटी को बढ़ावा देती है—जो लंबे समय में जमीन को उपजाऊ बनाती है.

10% ब्लेंडिंग का बड़ा प्लान

इंडियन बायोगैस एसोसिएशन (IBA) ने प्रस्ताव दिया है कि 2030 तक केमिकल खादों में 10% FOM ब्लेंडिंग अनिवार्य की जाए. इसकी शुरुआत 2026-27 से 1% ब्लेंडिंग के साथ की जा सकती है, जिसे धीरे-धीरे 10% तक ले जाया जाएगा. इस योजना का एक बड़ा उद्देश्य भारत की गिरती मिट्टी की ऑर्गेनिक कार्बन मात्रा, जो फिलहाल लगभग 0.4% है, उसे सुधारना है. कम ऑर्गेनिक कार्बन की वजह से पैदावार और मिट्टी में नमी दोनों प्रभावित होती हैं.

आईबीए का कहना है कि अगर एफओएम की ब्लेंडिंग शुरू कर दी जाए तो भारत का आयात बिल कम होगा, डॉलर खर्च करने की जरूरत मंद पड़ेगी.

डॉलर बचाने का मौका

भारत हर साल भारी मात्रा में खादों का आयात करता है. 2025-26 में यह खर्च 18 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. रूस, चीन, सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों से आयात पर यह निर्भरता एक बड़ा आर्थिक बोझ है. ऐसे में अगर केवल 10% FOM ब्लेंडिंग लागू हो जाती है, तो अनुमान है कि भारत हर साल करीब 2 अरब डॉलर तक की बचत कर सकता है.

क्यों जरूरी है बदलाव

मौजूदा समय में खेती में रासायनिक खादों का असंतुलित इस्तेमाल बड़ा संकट बन गया है. आदर्श NPK अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, लेकिन यह बिगड़कर लगभग 9.3:3.5:1 पर पहुंच गया है. यानी किसान जरूरत से कहीं ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संतुलन सुधारा जाए, तो यूरिया की खपत अपने आप कम हो जाएगी और देश खाद में आत्मनिर्भर बन सकता है.

वैश्विक हालात भी दे रहे संकेत

मिडिल ईस्ट और अन्य क्षेत्रों में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने खाद आपूर्ति को अनिश्चित बना दिया है. ऐसे में विदेशी खादों पर निर्भरता भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है. FOM जैसे विकल्प इस जोखिम को कम कर सकते हैं. 

किसानों के सामने चुनौतियां

हालांकि इस योजना को लागू करना आसान नहीं होगा क्योंकि किसान अभी भी केमिकल खादों पर ज्यादा भरोसा करते हैं. जैविक खाद को संभालना और इस्तेमाल करना आसान नहीं है और हर जगह एक जैसी क्वालिटी मिल पाना भी चुनौती भरा काम है. इसके लिए रिसर्च, ट्रेनिंग और ICAR जैसी संस्थाओं की मदद की जरूरत होगी.

सरकारी योजनाओं से मिलेगा सहारा

IBA ने सुझाव दिया है कि FOM को Nutrient-Based Subsidy (NBS) और Soil Health Card (SHC) योजनाओं से जोड़ा जाए. साथ ही, ऑर्गेनिक कार्बन को भी पोषक तत्व मानकर सब्सिडी देने की बात कही गई है. 

खेती और पर्यावरण दोनों को फायदा

अगर यह मॉडल कामयाब होता है, तो इसके कई फायदे होंगे. जैसे किसानों की खेती की लागत घटेगी, मिट्टी की सेहत सुधरेगी, फसल की क्वालिटी बढ़ेगी, पर्यावरण प्रदूषण कम होगा और डॉलर जैसी विदेशी मुद्रा की बचत होगी. इसके बारे में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपील भी कर चुके हैं कि केमिकल खादों पर निर्भरता घटाएं और जैविक खादों का प्रयोग बढ़ाएं.

कुल मिलाकर, FOM ब्लेंडिंग खेती में एक बड़ा बदलाव ला सकती है. यह कदम न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में अहम है, बल्कि भारत को टिकाऊ और आत्मनिर्भर कृषि की ओर भी ले जा सकता है.

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